जागरण संवाददाता, उत्तरकाशी। Year Ender 2021 हिमालय की ऊंची चोटियों के आरोहण के दौरान एवलांच की घटनाएं पर्वतारोहण के इतिहास में नई नहीं हैं। हिमालय की अधिकांश चोटियों पर आरोहण के दौरान एवलांच से कई पर्वतारोहियों, शेरपा और पोर्टर की मौत हुई। कई पर्वतारोहियों का आज तक पता नहीं चल पाया है।

वर्ष 2021 में एवलांच की एक बड़ी घटना चमोली और बागेश्वर जनपद की सीमा पर स्थित माउंट त्रिशूल (7120 मी.) में नौसेना के पर्वतारोही दल के साथ घाटित हुई। एक पोर्टर सहित पांच पर्वतारोही एवलांच की चपेट में आए। एक सप्ताह तक हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल गुलमर्ग (हवास), नेहरू पर्वतरोहण संस्थान (निम) और वायु सेना ने खोज बचाव अभियान चलाया। तब जाकर नौसेना के चार पर्वतारोहियों के शव तो बरामद हुए हैं, लेकिन, नौसेना का एक पर्वतारोही और एक पोर्टर अभी भी लापता है।

भारतीय नौसेना का यह अभियान दल स्वर्णिम विजय वर्ष के उपलक्ष्य में माउंट त्रिशूल के आरोहण पर गया था। 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर भारतीय सेना की विजय के 50 वर्ष पूरे होने पर पर थल, नौसेना और वायु सेना ने वर्ष 2021 को स्वर्णिम विजय वर्ष के रूप में मनाया है। इसी अभियान के तहत नौसेना के पर्वतारोहियों का 20 सदस्यीय दल त्रिशूल चोटी के आरोहण के लिए 3 सितंबर को मुंबई से रवाना हुआ था। दल चमोली के नंदप्रयाग घाट होते हुए माउंट त्रिशूल के बेस कैंप होमकुंड पहुंचा। कई दिनों तक त्रिशूल चोटी के बेस कैंप, कैंप वन और कैंप टू क्षेत्र में अभ्यास करने के बाद दल 30 सितंबर की रात को आरोहण के लिए आगे बढ़ा। 1 अक्टूबर की सुबह करीब पांच बजे दल 6700 मी. की ऊंचाई पर पहुंचा।

पर्वतारोही दल बर्फ की सतह का सही अनुमान नहीं लगा पाया। भारी हिमस्खलन हुआ तो दल में आगे चल रहे एक पोर्टर सहित पांच नौसेना के अधिकारी चपेट में आए थे। भले ही पर्वतारोहण के इतिहास में पहली घटना नहीं है। उत्तराखंड में पिछले 30 वर्षों के अंतराल में 20 से अधिक एवलांच की घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें पर्वतारोहियों को जान गंवानी पड़ी है। वर्ष 2019 में नंदा देवी चोटी पर चार विदेशी पर्वतारोहियों सहित आठ की मौत भी एवलांच के कारण हुई थी। निम के प्रधानाचार्य कर्नल अमित बिष्ट कहते हैं कि पर्वतारोहण एक साहसिक पर्यटन और खेल है।

इसमें पूरी तरह से जोखिम हैं। उच्च हिमालय क्षेत्र का अनुभव होना जरूरी है। उच्च हिमालय क्षेत्र में मौसम पल-पल बदलता है। इसके लिए अनुभवी और प्रशिक्षित गाइड और शेरपा होने चाहिए। जिन्हें एवलांच और क्रेवास होने का अनुभव हो। लेकिन, कभी अति उत्साह में भी दुर्घनाएं घटित हो जाती हैं। उत्तराखंड हिमालय की नंदा देवी, त्रिशूल, चौखंबा, सतोपंथ, केदारडोम, गंगोत्री-तृतीय सहित अन्य चोटियों पर एवलांच की कई घटनाएं हुई हैं।

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Edited By: Sunil Negi