देहरादून, जेएनएन। उत्तराखंड में मौजूद पांडुलिपि संपदा के रहस्यों को उजागर करने के लिए प्रयास तेज किए जाएंगे। यह कार्य राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन, संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार और पुराना दरबार आर्कियोलॉजिकल एंड मैटरियल कलेक्शन ट्रस्ट की ओर से संयुक्त रूप से किया जाएगा। पांडुलिपियों की कठिन भाषा को सरल और सार्वजनिक करने के लिए दून के कैंब्रियन हॉल स्कूल में 16 से 18 मई तक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जा रही है। जिसमें देश के जाने-माने पांडुलिपि विशेषज्ञ हिस्सा लेंगे।

बुधवार को प्रेस क्लब में आयोजित पत्रकार वार्ता में संगोष्ठी के संयोजक डॉ. देवेंद्र कुमार सिंह ने इस बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में पांडुलिपियों का पुराना इतिहास रहा है। यहां कई लोगों के घरों से पांडुलिपियां प्राप्त हो चुकी हैं। लेकिन, आधिकारिक तौर पर अभी इन पर बहुत कम काम हो सका है। प्रदेश की इन धरोहर को दुनिया तक पहुंचाने के उद्देश्य से यह राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जा रही है। प्रदेश के चारों धामों में भी पांडुलिपियां मौजूद हैं। सुरेंद्र सिंह सजवाण ने कहा कि कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में प्रकाशन विभाग के पूर्व महानिदेशक पद्मश्री डॉ. श्याम सिंह शशि मौजूद रहेंगे। वहीं, डॉ. एससी ब्याला की टहकन से बनी जैमिनीयाश्वमेध की पांडुलिपि पर आधारित शोध ग्रंथ का विमोचन भी किया जाएगा। संगोष्ठी में साहित्यकार वीणापाणी जोशी, राजेश्वरी चंदोला और सविता कपूर को उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए सम्मानित भी किया जाएगा। इस दौरान प्रेस वार्ता में कीर्ति प्रताप सिंह, ठाकुर भवानी पंवार, डॉ. एससी ब्याला मौजूद रहे।

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Posted By: Sunil Negi

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