देहरादून, केदार दत्त। उच्च हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले राज्य पुष्प ब्रह्मकमल के बाद अब इसके परिवार के तीन अन्य सदस्यों कस्तूरी, फेन व नील कमल भी नर्सरी में उगेंगे। वन विभाग की अनुसंधान विंग ने इसके लिए देश के अंतिम गांव माणा (चमोली) की वन पंचायत की नर्सरी में कसरत शुरू कर दी है। इस कड़ी में उच्च हिमालयी क्षेत्र के नंदी कुंड से इन प्रजातियों के राइजोम (कंद) एकत्रित किए जा रहे हैं। वन संरक्षक अनुसंधान वृत्त संजीव चतुर्वेदी के मुताबिक कोशिश है कि ब्रह्मकमल परिवार की यह तीनों प्रजातियां अगले साल नर्सरी में उग जाएं। इस पहल के पीछे इन कमल पुष्प प्रजातियों के संरक्षण की मंशा है।

समुद्रतल से 3800 से 4600 मीटर की ऊंचाई पर मिलने वाले राज्य पुष्प ब्रह्मकमल का धार्मिक और औषधीय महत्व है। केदारनाथ में रक्षाबंधन के मौके पर ब्रह््मकमल से बाबा केदार की पूजा की जाती है। इसके अलावा हर साल नंदादेवी लोकजात के समापन पर नंदाष्टमी को बेदनी व बालपाटा बुग्याल में इसी पुष्प से नंदादेवी की पूजा होती है। यह दुर्लभ पुष्प तिब्बतन चिकित्सा पद्धति में विभिन्न रोगों के उपचार में लाया जाता है।

ब्रह््मकमल के संरक्षण के मद्देनजर वन विभाग की अनुसंधान विंग ने पिछले साल प्रयास शुरू किए। इसके तहत माणा वन पंचायत की नर्सरी में ब्रह्मकमल के कंद लगाने के साथ ही बीज भी बोए गए। अनुसंधान वृत्त के वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी के अनुसार कंद से जो पौधे लगाए गए थे, उनमें इस वर्ष जून में फूल खिले। अलबत्ता, बीज से पौधे तो उगे हैं, उनके खिलने का इंतजार है।

आइएफएस चतुर्वेदी के अनुसार इस साल ब्रह्कमल परिवार के तीन अन्य सदस्यों कस्तूरी कमल, फेन कमल व नील कमल को भी उगाने की तैयारी है। उन्होंने बताया कि ब्रह््मकमल की तरह यह तीनों कमल भी औषधीय दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। कस्तूरी कमल 3700 से 5700 मीटर और फेन व नील कमल 4000 से 5600 मीटर की ऊंचाई पर उगते हैं।

उन्होंने जानकारी दी कि इन तीनों पुष्प प्रजातियों के रोपण के मद्देनजर इनके कंद एकत्रित करने का वन क्षेत्राधिकारी की अगुआई में एक दल चमोली जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र के नंदीकुंड क्षेत्र में भेजा गया है। कंद एकत्रित होने के बाद इन्हें भी माणा वन पंचायत की नर्सरी में रोपा जाएगा।

वन संरक्षक चतुर्वेदी ने कहा कि जिस तेजी से तमाम वनस्पतियां व पुष्प प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं, उसे देखते हुए इनका संरक्षण आवश्यक है। इसी क्रम में ब्रह्मकमल के साथ ही इसके परिवार के तीन अन्य सदस्यों को संरक्षण देने की मुहिम शुरू की गई है। इसके पीछे मंशा यही है कि यदि ये कहीं विलुप्त भी हो गए तो सैंपल सुरक्षित रहने पर उन्हें वहां फिर से उगाया जा सकेगा।

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उत्तराखंड में चार प्रजातियां

आइएफएस चतुर्वेदी बताते हैं कि ब्रह्मकमल परिवार की विश्वभर में 61 प्रजातियां पाई जाती हैं। सभी औषधीय गुणों से लबरेज हैं। इनमें से उत्तराखंड में ब्रह््मकमल, कस्तूरी कमल, नील कमल व फेन कमल ही मिलती हैं।

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Posted By: Sunil Negi

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