किसी शहर का ढांचागत विकास उसकी रीढ़ होता है। ढांचागत विकास (इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट) जितना विविध और सुदृढ़ होगा, शहर उतना ही बेहतर नजर आएगा। दैनिक जागरण की पहल माय सिटी माय प्राइड महाभियान के तहत शनिवार को दैनिक जागरण कार्यालय में आयोजित राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस (आरटीसी) में जब देहरादून के ढांचागत विकास पर विषय विशेषज्ञों ने चर्चा की तो 18 साल की प्रगति से लेकर बढ़ती चुनौतियों की पड़ताल की गई। साथ ही भविष्य की उम्मीद का रोडमैप भी खींचा गया।

रिंग रोड का हो निर्माण
रोड एंड ट्रांसपोर्ट सिस्टम से शुरू हुई कॉन्फ्रेंस में लोनिवि के रिटायर्ड मुख्य अभियंता एके बिष्ट ने कहा कि सबसे पहले सड़कों पर होने वाले अतिक्रमण को दूर करने के लिए ठोस उपाय करने होंगे। दून की सड़कों पर बाहरी क्षेत्र से आने वाले ट्रैफिक दबाव को कम करने के लिए फोर लेन रिंग रोड की परिकल्पना को साकार करना होगा। इसी तरह सड़कों पर बढ़ रहे दबाव को नियंत्रित करने के लिए मास ट्रांसपोर्ट पर भी गंभीरता से पहल करने की जरूरत हैं।

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मास्टर प्लान की सड़क की धरातलीय चौड़ाई आधार
ब्रिगेडियर केजी बहल (रिटा.) ने चर्चा को विस्तार देते हुए सवाल खड़े किए कि मास्टर प्लान में सड़क की चौड़ाई को देखते हुए बड़े निर्माण को हरी झंडी दी जा रही है, जबकि धरातल पर चौड़ाई आधी भी नहीं होती। 

 

बड़ा सवाल, हाईकोर्ट को क्यों देना पड़ा आदेश
मेकिंग ए डिफरेंस बाई बीइंग दि डिफरेंस (मैड) के संस्थापक अध्यक्ष अभिजय नेगी ने कहा कि इन दिनों हाईकोर्ट के आदेश पर सड़कों पर पसरे अतिक्रमण पर ताबड़तोड़ कार्रवाई की जा रही है। इससे शहर की बेहतरी की उम्मीद बढ़ी है, पर हमारे सिस्टम को इस पर विचार करना चाहिए कि आखिर हाईकोर्ट को क्यों यह आदेश जारी करने को बाध्य होना पड़ा।

आबादी बढ़ी, सुविधाओं में समुचित इजाफा नहीं
इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष राकेश भाटिया ने सड़कों की गुणवत्ता बढ़ाने पर बल देते हुए उदाहरण दिया कि वर्ष 1911 में देहरादून की आबादी महज 42 हजार के करीब थी, जो आज बढ़कर दून नगर में साढ़े पांच लाख और आसपास के क्षेत्रों को मिलाकर करीब नौ लाख हो गई है। ऐसे में जनदबाव के हिसाब जन सुविधाओं में भी इजाफा करने की जरूरत है।

 

स्मार्ट के साथ बसों की सुविधा भी बढ़े

गति फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष अनूप नौटियाल ने इस बिंदु पर अपनी बात का समावेश करते हुए कहा कि बेशक आज हम स्मार्ट ट्रांसपोर्ट सिस्टम में मेट्रो रेल, पॉड टैक्सी की बात कर रहे हैं, मगर शहर के भीतर सुगम यातायात के लिए स्मार्ट बसों की सुविधाएं विकसित करने की जरूरत है। नौटियाल ने बेहतर पेयजल व्यवस्था और सीवरेज सिस्टम को लेकर भी शहर हित में अपनी बात रखी।

मास्टर प्लान और धरातल में समानता नहीं
अब बारी थी दून के उस मास्टर प्लान पर बात करने की, जिसमें ढांचागत विकास के स्वरूप को परिभाषित किया गया है। उत्तरांचल इंजीनियर्स एंड ड्राफ्ट्समैन वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष डीएस राणा ने कहा कि मास्टर प्लान इतने विलंब से लागू किया गया कि जब तब अधिकांश धरातल बदल गया।

वर्ष 1982 में पहला मास्टर प्लान आया, जबकि आज तक जोनल प्लान का अता-पता नहीं है। ऐसे में सुनियोजित विकास किसी चुनौती से कम नहीं। क्योंकि प्लान व धरातल के लैंडयूज में भी भारी खामियां हैं।

मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) उपाध्यक्ष डॉ. आशीष श्रीवास्तव के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित अधीक्षण अभियंता अनिल त्यागी ने बताया कि मास्टर प्लान व सुनियोजित विकास की दिशा में क्या चुनौतियां हैं और उनका समाधान किस तरह किया जा रहा।

कूड़ा पृथक्करण की समुचित व्यवस्था जरूरी
बेहतर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम के बिना किसी भी शहर के ढांचागत विकास को पूरा नहीं माना जा सकता और दून रेजिडेंट्स वेलफेयर फ्रंट के अध्यक्ष डॉ. महेश भंडारी ने बताया कि बेशक लंबे इंतजार के बाद सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट संचालित हो रहा है, मगर कूड़ा उठान के लिए भी और प्रयास करने की जरूरत है। जो कूड़ा उठ भी रहा है, उसके पृथक्कीकरण के लिए अभी तक कोई व्यवस्था नहीं की जा सकी है।

ऊर्जा की चुनौती बरकरार
अंत में जब बिजली व्यवस्था की बात आई तो मांग के अनुरूप आपूर्ति के बाद भी कई ऐसे सवाल खड़े हो गए, जिसकी पूर्ति किए बिना संतोष व्यक्त नहीं किया जा सकता। ऊर्जा निगम के रिटायर्ड मुख्य अभियंता स्तर-प्रथम एनके जोशी ने ऊर्जा सेक्टर की खामियां गिनाने के साथ ही बताया कि समाधान क्या हो सकते हैं। खासकर सुझाव दिया कि जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों को पूरी ईमानदारी के साथ काम करने की जरूरत है।

पैनलिस्ट की राय

'अभी तक विभाग साबित करता है कि उसकी सड़क पर अतिक्रमण है, ऐसा कानून बने, जिसमें निर्माणकर्ता को यह साबित करने की व्यवस्था हो कि उसने अतिक्रमण नहीं किया है। फ्लाईओवर और रेलवे ओवर ब्रिज कम से कम 40 साल के दबाव के लिए डिजाइन किए जाएं।'
- एके बिष्ट, रिटायर्ड मुख्य अभियंता (लोनिवि)

'बीते दिनों हुई बारिश में 132 केवी लाइनों का टावर बह जाने के बाद किराए पर टावर लाकर चार दिन बाद आधे शहर की बिजली व्यवस्था सुचारू हो पाई। टावर मजबूती से खड़े रहें और वैकल्पिक इंतजाम जल्द सुलभ हों, इस पर विचार करने की जरूरत है।'
- एनके जोशी, रिटायर्ड मुख्य अभियंता स्तर-प्रथम, (ऊर्जा निगम)

कूड़ा उठान के लिए हर वार्ड में सेंट्रलाइज्ड मॉडल स्थापित किया जाना चाहिए। इसके अलावा सोर्स सेग्रिगेशन कर कूड़ा निस्तारण की आधी समस्या का समाधान संभव है।
- अभिजय नेगी, संस्थापक अध्यक्ष (मैड)

वर्ष 1982 में पहला मास्टर प्लान बनने के बाद से अब तक जोनल प्लान नहीं बन सका है। जबकि, नियमों के अनुसार जोनल प्लान के बिना मास्टर प्लान का मतलब नहीं है। इस दिशा में सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
- डीएस राणा, अध्यक्ष (उत्तरांचल इंजीनियर्स एंड ड्राफ्ट्समैन वेलफेयर एसोसिएशन)

अब उन सड़कों पर बड़े निर्माण की अनुमति नहीं दी जा रही है, जहां धरातल पर संकरी सड़कें हैं। लोगों को इसके प्रति जागरुक किया जा रहा है कि वह जमीन खरीदने से पहले संबंधित क्षेत्र के मास्टर प्लान के अनुरूप लैंडयूज की जानकारी एमडीडीए से प्राप्त कर लें।
- अनिल त्यागी, अधीक्षण अभियंता, एमडीडीए (राउंड टेबल में एमडीडीए उपाध्यक्ष के प्रतिनिधि)

एक्सपर्ट की राय

बिजली व्यवस्था की बेहतरी के लिए सक्षम स्तर पर जो भी सुझाव दिए जाते हैं, उन पर काम नहीं हो पाता। सुझावों का रिव्यू कर उनके मुताबिक काम करने की जरूरत है। - ब्रिगेडियर केजी बहल (रिटायर्ड)

कूड़ा निस्तारण में प्लास्टिक कचरे और अस्पतालों से निकलने वाले बायोमेडिकल वेस्ट के निस्तारण पर अभी कम ध्यान दिया जा रहा है। इस बात का ऑडिट होना चाहिए कि दून के 400 अस्पतालों की संख्या के बाद भी पर्याप्त मात्रा में बायोमेडिकल वेस्ट निस्तारण के लिए भेजा जा रहा है।
- अनूप नौटियाल, संस्थापक अध्यक्ष (गति फाउंडेशन)

आजकल शहर में अतिक्रमण ध्वस्त किए जा रहे हैं। जबकि इससे निकलने वाले वेस्ट के निस्तारण के लिए कुछ नहीं किया जा रहा। बरसात के मौसम में यह वेस्ट शहर की नालियों को चोक न करे, इसके लिए भी काम किया जाना चाहिए।
- डॉ. महेश भंडारी, अध्यक्ष (दून रेजीडेंट्स वेलफेयर फ्रंट)

पिछले दिनों हुई भारी बारिश के चलते आसन नदी में 33 केवी के करीब 70 पोल बह गए थे, जिससे अब तक भी सेलाकुई इंडस्ट्रियल एरिया की बिजली व्यवस्था पटरी पर नहीं आ पाई है। जबकि, इंडस्ट्री सेक्टर से 67 फीसद राजस्व मिलता है। ऐसे में ऊर्जा के मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है।
- राकेश भाटिया, अध्यक्ष (इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन)

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By Nandlal Sharma