गुजरे कुछ सालों में चिकित्सा के क्षेत्र में नए आयाम जुड़े हैं, लेकिन कुछ दिक्कतें भी साथ-साथ जुड़ती चली गईं। बात सस्ते इलाज की हो या फिर मरीज और डॉक्टर के बीच रिश्ते की, दोनों ही हाशिये पर जाती दिखीं। व्यावसायिकता हावी हुई और प्रबंधन लचर। इसका खामियाजा सेहत के मोर्चे पर आमजन को भुगतना पड़ रहा है। इस सबके बीच कुछ ऐसी ऐसी संस्थाएं भी हैं, जो इन दिक्कतों को महसूस करते हुए जन को राहत पहुंचाने के प्रयासों में जुटी हैं। लेकिन, इसे समग्रता तभी मिलेगी, जब सरकारी, गैरसरकारी और सामाजिक क्षेत्र की इसमें बराबर की भागीदारी हो। बात देहरादून की करें तो तस्वीर बेहद धुंधली तो नहीं, लेकिन चिंता की लकीरें जरूर खींचती दिखती है।

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कुछ इसी तरह का निष्कर्ष निकला 'दैनिक जागरण' के महाभियान 'माय सिटी माय प्राइड' के फोरम पर। दैनिक जागरण कार्यालय में आयोजित इस राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस (आरटीसी) में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी हस्तियों और समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले विशेषज्ञों ने राजधानी देहरादून की स्वास्थ्य सेवाओं के अभी तक के सफर, व्यवहारिक दिक्कतों, भविष्य की चुनौतियों और इन सभी के समाधान पर बेबाकी से अपनी राय रखी।

साथ ही सिस्टम को तमाम मोर्चों पर जिम्मेदार ठहराया। विशेषज्ञों ने सुझाया कि सभी मिलकर कुछ न कुछ प्रयास करें तो सेहत के लिहाज से दून की तस्वीर बदलने में देर नहीं लगेगी। विशेषज्ञों ने इस बात का वायदा भी किया जागरण के इस अभियान को आगे बढ़ाने में उनके स्तर से जो भी सहयोग चाहिए होगा, वह हमेशा तत्पर रहेंगे।

पाटनी होगी असमानता की खाई
फोरम में एक तरफ विशेषज्ञों का लंबा अनुभव था तो दूसरी तरफ आमजन की ओर से तमाम चिंताएं भी। बात सामने आई कि स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से दून प्रगति के पथ पर अग्रसर है, मगर कई चुनौतियां भी सामने खड़ी हैं। एक बड़ा सच यह है कि उपचार की लागत बढ़ रही और इससे स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं तक पहुंचने में असमानता आई है। इस पर गहनता से सोचने की जरूरत है।

स्वास्थ्य सेवाएं सुदृढ़ करने की दरकार
विमर्श में निष्कर्ष निकला कि प्राथमिक स्तर की स्वास्थ्य सुविधाओं को सुदृढ़ किए जाने की आवश्यकता है। सिस्टम है, जरूरत सिर्फ बेहतर प्रबंधन की है। इसके अलावा प्रिवेंटिव हेल्थ पर भी विशेषज्ञों ने जोर दिया। उनका मानना है कि अगर इन पहलू पर ध्यान दिया जाए तो बड़े खतरे को कम किया जा सकता है।

फैमिली फिजीशियन का कॉन्सेप्ट
एक बात और भी कही गई। वह यह कि विशेषज्ञता के इस युग में फैमिली फिजीशियन या जनरल प्रैक्टिशनर का कांसेप्ट तेजी से गायब हो रहा है। पहले जो चीजें एक पारिवारिक चिकित्सक के दायरे में आती थीं, वह अलग-अलग स्पेशलाइजेशन के बीच बंटती जा रही हैं। इसने रोगी और डॉक्टर के बीच बातचीत खत्म सी कर दी है। फैमिली फिजीशियन को पूरे परिवार की मेडिकल हिस्ट्री पता होती थी और वह स्वास्थ्य की स्थिति से निपटने के बारे में मरीज की चिंता से परिचित होता था। हमें इस संस्कृति को वापस लाने की जरूरत है।

विश्वसनीयता का भी मुद्दा
विमर्श में एक मुद्दा सरकारी अस्पतालों की कम होती विश्वसनीयता को लेकर भी उठा। इस पर विशेषज्ञों की ओर से जवाब आया कि सरकारी अस्पतालों में संसाधन कम नहीं हैं, लेकिन प्रबंधन के स्तर पर खामियां हैं। इस पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।

इमरजेंसी सेवा का हो मजबूत तंत्र
दून में एक बड़ी चिंता आपातकालीन सेवाओं को लेकर भी है। बात निकलकर सामने आई कि सरकारी की बात छोडि़ए, निजी क्षेत्र में भी इसे लेकर मजबूत तंत्र नहीं है। रात के वक्त विशेषज्ञ की सेवा क्या, प्रारंभिक उपचार भी मिल जाए तो गनीमत है।

संयमित व्यवहार से दूर होगा गतिरोध
डॉक्टर, मरीज और तीमारदार के बीच बढ़ते गतिरोध का मसला भी विमर्श में उभरा। विशेषज्ञों ने कहा कि इसे दूर करने के लिए प्रत्येक पक्ष को एक-दूसरे की स्थिति समझते हुए व्यवहार संयमित रखना होगा।

मिले अच्छा सरकारी अस्पताल
दून में स्वास्थ्य को लेकर जो सबसे बड़ी चुनौती आज मुंह बाए खड़ी है, वह ये कि यहां एक अच्छा सरकारी अस्पताल नहीं है। दून अस्पताल के मेडिकल कॉलेज में तब्दील होने से दिक्कत बढ़ी है। लिहाजा, राजधानी में एक अच्छा सरकारी अस्पताल बेहद जरूरी है। विमर्श में स्वास्थ्य जागरूकता और पैरामेडिकल स्टाफ को और दक्ष बनाने की आवश्यकता भी जताई गई।

चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण उत्तराखंड के पूर्व महानिदेशक डॉ. आरपी भट्ट ने कहा कि 'स्वास्थ्य पर एकाकीपन छोड़, हमें समग्र सोच रखनी होगी। विभागों एवं एजेंसियों के बीच ऊपर से लेकर जमीनी स्तर तक समन्वय सुनिश्चित करना होगा। संसाधन हैं पर कहीं न कहीं खामी सिस्टम में है। जिसे अधिक प्रभावी बनाने के लिए तीन स्तर पर कदम उठाने होंगे। नीतिगत, प्रबंधकीय और क्रियान्वयन के स्तर पर। स्वास्थ्य समस्याओं का तीन-चौथाई दरअसल प्राथमिक एवं उपचारात्मक स्वास्थ्य मुद्दों से जुड़ा है, लिहाजा इन स्तरों पर संसाधनों को सशक्त बनाना जरूरी है।

विख्यात प्लास्टिक सर्जन डॉ. योगी ऐरन ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र में सुपर स्पेशिलिस्ट की कमी है, तो वहीं निजी क्षेत्र में एक से बढ़कर एक क्वालीफाइड डॉक्टर मौजूद हैं। यह डॉक्टर किसी न किसी रूप में सामाजिक स्वास्थ्य के लिए काम कर रहे हैं। सरकार को चाहिए कि वह इनके काम को मान्यता दे और सार्वजनिक क्षेत्र में इनकी मदद ली जाए। इसके अलावा जागरूकता का भी भारी अभाव है। इस बावत भी प्रभावी रणनीति बनानी चाहिए।

वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. सुमिता प्रभाकर ने कहा कि हर व्यक्ति के लिए अच्छे स्वास्थ्य को लेकर बराबर सजग रहने के साथ ही जागरूक होना जरूरी है। ऐसी जरूरत ही क्यों पड़े कि अस्पताल जाने की नौबत आए। उपचार से बेहतर निवारण पर ध्यान दिया जाए, लेकिन अब भी एक बड़ी आबादी इसे लेकर सजग नहीं है। हम कैंसर स्क्रीनिंग कैंप लगाते हैं, तो कई महिलाओं का सवाल होता है कि हमें कैंसर है ही नहीं तो स्क्रीनिंग क्यों कराएं। इसके अलावा पैरामेडिकल स्टाफ को भी अधिक दक्ष बनाने की जरूरत है।

आईएमए की पूर्व अध्यक्ष डॉ. गीता खन्ना ने कहा कि हेल्थ सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए जरूरी है कि प्राथमिक स्वास्थ्य पर ज्यादा से ज्यादा फोकस किया जाए। असल में प्राथमिक स्तर की सुविधाएं जनस्वास्थ्य में सुधार में सबसे अहम भूमिका निभाती हैं। यदि हम प्राथमिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर मजबूत होंगे तो आइसीयू-वेंटीलेटर तक सोचने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर ऐसा ही प्रयास है। किसी भी बीमारी को प्रारंभिक स्तर पर पहचान लिया जाए तो उपचार का खर्च कम किया जा सकता है।

स्पेक्स संस्था के सचिव डॉ. बृजमोहन शर्मा ने कहा कि प्रिवेंटिव हेल्थकेयर यानी सावधानियां बरतने पर ध्यान देना चाहिए। पानी, पर्यावरण और पोषण की स्वच्छता से इलाज का खर्च काफी हद तक कम हो जाता है। इस ओर जागरूकता की कमी है। सरकारी अस्पतालों की मशीनों का नियमित रूप से कैलीब्रेशन न होना भी एक मुद्दा है। यही वजह है कि जांच की विश्वसनीयता कम हो जाती है। इसके अलावा जेनरिक दवा के निर्देश का भी सख्ती से अनुपालन कराया जाना चाहिए।

पछवादून विकलांग अभिभावक एसोसिएशन के अध्यक्ष विनय कुमार सैनी ने कहा कि इमरजेंसी मामलों में मरीज अब भी निजी अस्पतालों पर निर्भर हैं। रात के समय इमरजेंसी में जाना मतलब व्यर्थ भटकना है। एक तरफ हम स्वास्थ्य क्षेत्र में बूम की बात कर रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि रात के वक्त सामान्य उपचार भी मरीज को बमुश्किल मिल पाता है। इस स्थिति को दूर करने की जरूरत है। स्वास्थ्य में सार्वजनिक क्षेत्र के लिए कहीं न कहीं विश्वसनीयता का भी संकट है, जिस पर नीति नियंताओं को गंभीरता से सोचना होगा।

ये हैं दून के सामने चुनौतियां
- सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों का अभाव।
- मरीज को रेफर करने की बढ़ती प्रवृत्ति।
- सरकारी अस्पतालों पर विश्वसनीयता का संकट।
- निजी व सरकारी क्षेत्र के बीच बढ़ी खाई।
- क्रिटिकल केयर में सरकारी तंत्र फेल।
- डॉक्टर व मरीजों के बीच कम होता संवाद।
- प्रिवेंटिव हेल्थ केयर पर नहीं ध्यान।
- अस्पतालों में मूलभूत सुविधाओं की कमी।
- महंगी दवा, महंगे उपचार का बढ़ रहा बोझ।

ये सुझाए गए समाधान
- हेल्थ सिस्टम को मजबूत बनाने लिए प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं को केंद्र में रखा जाए।
- स्वास्थ्य विभाग, नगर निगम, स्वयंसेवी संस्थाएं, अन्य एजेंसियां और कॉरपोरेट सेक्टर के मध्य हो समन्वय।
- प्रिवेंटिव हेल्थ व स्वास्थ्य जागरूकता को लेकर बने कारगर नीति।
- आपसी सहभागिता व तालमेल से कम होगा निजी व सरकारी क्षेत्र के बीच बढ़ रहा गैप।
- सार्वजनिक क्षेत्र में क्रिटिकल व इमरजेंसी केयर को करना होगा सुदृढ़।
- अस्पतालों के शुल्क पर प्रभावी नियंत्रण व जेनरिक दवा के निर्देशों पर सख्ती से अमल।

By Nandlal Sharma