जब पेयजल की बात आती है तो उसे फिजिकल, केमिकल और बायलॉजिकल कसौटी पर परखा जाता है। दून में पेयजल की अधिकांश आपूर्ति ट्यूबवेल के जरिए की जाती है, लिहाजा फिजिकल और केमिकल रूप से पानी दुरुस्त है। यह कहना है उत्तराखंड जल संस्थान के सेवानिवृत्त मुख्य महाप्रबंधक एसके गुप्ता का।

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हालांकि, एसके गुप्ता यह भी कहते हैं कि बायलॉजिकल रूप में पानी की गुणवत्ता को लेकर काफी चुनौती का सामना करना पड़ता है। इसकी वजह यह कि दून के बड़े हिस्से में अभी भी दशकों पुरानी लाइनें पड़ी हैं, जो जर्जर हालत में भी पहुंच चुकी है। कई लाइनें नालियों से भी गुजर रही हैं। ऐसे में सीपेज के चलते घरों में दूषित जलापूर्ति भी हो जाती है।

इसमें सबसे खतरनाक है, पानी की फीकल कॉलीफॉर्म की मात्रा का होना। पेयजल लाइनों के इसी अव्यवस्थित और कम सुदृढ़ जाल के कारण केंद्र सरकार ने पानी में निश्चित मात्रा को क्लोरीन मिलाने की अनिवार्यता की है। यह नियमित रूप से किया जाने वाला काम है और कई बार इसमें भी लापरवाही बरती जाती है।

इसके अलावा दून के कुछ हिस्सों में खुले स्रोतों से भी पेयजल की आपूर्ति की जाती है। इस स्रोतों के पानी में हार्डनेस अधिक है। पानी की हार्डनेस कम करने के लिए सॉफ्टनेस प्लांट बनाया गया है और ज्यादातर समय पानी की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप रहती है। फिर भी कई बार हार्डनेस को लेकर सवाल खड़े होते रहते हैं।

गुणवत्ता पर सरकारी बनाम निजी रिपोर्ट जल संस्थान जिस पेयजल की आपूर्ति करता है, उसकी बेहतर गुणवत्ता को लेकर दावा भी करता है। हालांकि जब इसी पेयजल की गुणवत्ता की जांच निजी संस्था स्पैक्स (सोसाइटी ऑफ पॉल्यूशन एंड एनवायरमेंटल कंजर्वेशन साइंटिस्ट्स) करती है तो उसमें तमाम खामियां उजागर होने लगती हैं।

स्पैक्स की जून माह की ही रिपोर्ट पर गौर करें तो 96 में से दो क्षेत्रों के ही नमूने मानकों पर खरे उतरे। कहीं पानी में टीडीएस (टोटल डिजॉल्व सॉलिड) की मात्रा मानक से कहीं अधिक पाई गई तो कहीं क्लोरीन की मात्रा अधिक, जबकि कहीं क्लोरीन पूरी तरह गायब पाया गया। जिस फीकल कॉलीफॉर्म की मात्रा शून्य होनी चाहिए, उसकी उपस्थिति भी पेयजल में पाई गई।

फिर भी जल संस्थान इन आंकड़ों को नकारता आया है। यदि जल संस्थान को लगता है कि उसका पानी गुणवत्तायुक्त है तो कहीं न कहीं अधिकारी लोगों को भरोसा नहीं दिला पा रहे। यही कारण यह कि लोग जल संस्थान की ओर से सप्लाई किए जा रहे पानी को सीधे पीने के बजाए आरओ के माध्यम से उसका सेवन कर रहे हैं।

रिपोर्ट में यह किया गया था खुलासा
स्पैक्स ने कई जनप्रतिनिधियों के घर में सप्लाई किए जा रहे पेयजल की भी जांच की थी। टिहरी लोकसभा क्षेत्र की सांसद माला राज्य लक्ष्मी शाह के आवास के पानी में टीडीएस की मात्रा 460 मिलीग्राम प्रति लीटर पाई गई। इसी तरह कबीना मंत्री सुबोध उनियाल के आवास पर 430, विधायक हरबंस कपूर के यहां 432, खजान दास के आवास पर 426 और विनोद चमोली के आवास पर टीडीएस की मात्रा 416 पाई गई, जबकि यह मात्रा 300 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए।

टीडीएस में कैल्सियम-मैग्नीशियम की मात्रा अधिक
यदि पानी में टीडीएस की मात्रा 1500 भी हो, मगर उसमें कैल्सियम-मैग्नीशियम के बाईकार्बोनेट की मात्रा अधिक नहीं है तो उससे नुकसान नहीं होगा, जबकि दून में यह मात्रा सीमा से अधिक होने के चलते पानी की हार्डनेस नुकसानदेह है।

यह पाई गई स्थिति (मिलीग्राम प्रति ली.)
कैल्सियम बाईकार्बोनेट, 82 से 146 (अधिकतम सीमा 75)
मैग्नीसियम बाईकार्बोनेट, 18 से 73 (अधिकतम सीमा 30)

फीकल कॉलीफार्म भी पाया गया
पानी में फीकल कॉलीफॉर्म की मात्रा शून्य होनी चाहिए। जबकि पानी में सीवर आदि से इसकी उपस्थिति पाई जाती है। दून में 37 स्थानों की सैंपलिंग में सबसे अधिक 62 मोस्ट प्रोबेबल नंबर/100 एमएल फीकल के पाए गए। इसके अलावा टोटल कॉलीफॉर्म की मात्रा भी 10 से अधिक नहीं होना चाहिए। जबकि उक्त 37 स्थानों पर ही यह मात्रा भी सीमा से अधिक पाई गई।

जल संस्थान के रिटायर्ड मुख्य महाप्रबंधक एसके गुप्ता का कहना है कि पेयजल में फीकल को जाने से रोकने के लिए जर्जर लाइनों को दुरुस्त किया जाना जरूरी है। उन्होंने बताया कि एडीबी पोषित योजना के तहत करीब 150 किलोमीटर लाइनों को बदला भी जा चुका है। ऐसे में इन इलाकों में फीकल कॉलीफॉर्म की शिकायत नहीं होनी चाहिए।

सीवरेज व्यवस्था सुधरी, कायापलट की दरकार
एसके गुप्ता के अनुसार चार-पांच साल पहले तक 6.5-07 एमएलडी (मिलियन लीटर डेली) सीवर रिस्पना और बिंदाल नदी में उड़ेला जाता है, जबकि अब 15 एमएलडी से अधिक सीवर का निस्तारण करने के लिए दो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट मौजूद हैं। चुनौती सिर्फ इस बात की है कि अभी सीवर लाइन के बड़े नेटवर्क को प्लांट से नहीं जोड़ा जा सका है। खासकर शहर के पुराने हिस्से में मौजूद करीब 25 फीसद सीवर लाइनों को बदला जाना जरूरी है।

सॉलिड वेस्ट प्लांट से सुधरी व्यवस्था 

यह अच्छी बात है कि लंबे इंतजार के बाद शीशमबाड़ा में सॉलिड वेस्ट प्लांट बनकर तैयार हो गया है। इसमें रोजाना करीब 200 मीट्रिक टन कूड़ा निस्तारण के लिए भेजा जा रहा है। हालांकि अभी कूड़ा उठान की व्यवस्था में अपेक्षित सुधार किए जाने की जरूरत है। क्योंकि दून में रोजाना 290 मीट्रिक टन से अधिक कूड़ा निकलता है। हालांकि अच्छी बात यह है कि देहरादून नगर निगम कूड़ा उठान के लिए जल्द नई कंपनी के साथ करार करने जा रहा है। साथ ही शहर की सफाई व्यवस्था के लिए कूड़े का उठान चरणवार ढंग से किए जाने की जरूरत है। 

By Krishan Kumar