एमबीबीएस दाखिला फर्जीवाड़ा: एक पीपीओ पर चार दावेदार, यूपी तक पहुंची स्वतंत्रता सेनानी प्रमाण पत्र की जांच
एमबीबीएस दाखिले के लिए फर्जी स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाण पत्र बनाने वाले गिरोह का खुलासा हुआ है, जिसमें एक ही पीपीओ नंबर का चार अभ्यर्थियों के लिए इस्तेमाल किया गया।

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सोबन सिंह गुसांई, देहरादून। एमबीबीएस में दाखिला दिलाने के लिए फर्जीवाड़े का जाल बिछाने वाले गिरोह ने कई अभ्यर्थियों के लिए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र तैयार कराने का प्रयास किया, लेकिन दस्तावेजों में की गई गलतियों ने ही पूरे खेल की परतें खोल दीं।
क्लेमेनटाउन और रायपुर क्षेत्र से जुड़े चार मामलों की जांच में सामने आया है कि अभ्यर्थियों के लिए तैयार किए गए स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों में लगाए गए पेंशन भुगतान आदेश (पीपीओ) नंबर भी संदिग्ध हैं।
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मेल नहीं खाए पीपीओ नंबर
जांच में अब तक ये नंबर उत्तराखंड के किसी स्वतंत्रता सेनानी के पीपीओ नंबर से मेल नहीं खाए हैं। ऐसे में जांच एजेंसियां अब उत्तर प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानियों के पीपीओ नंबरों से भी इनका मिलान कर रही हैं। जांच में एक अहम तथ्य यह भी सामने आया है कि जिन अभ्यर्थियों को स्वतंत्रता सेनानी आश्रित श्रेणी का लाभ दिलाने की कोशिश की गई, उनके दस्तावेजों में जिस स्वतंत्रता सेनानी का हवाला दिया गया, उसका नाम संबंधित ताम्रपत्र में ही नहीं मिला।
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इससे प्रमाणपत्रों की प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि दस्तावेज तैयार करने के लिए वास्तविक स्वतंत्रता सेनानियों के रिकार्ड से छेड़छाड़ की गई या किसी अन्य राज्य के रिकार्ड को आधार बनाया गया।
चार अभ्यर्थियों के लिए एक ही पीपीओ नंबर
मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि चार अलग-अलग अभ्यर्थियों के लिए तैयार किए गए दस्तावेजों में एक ही पीपीओ नंबर का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। चारों प्रमाणपत्रों में धर्मवीर नाम दर्ज है। यह गड़बड़ी पटवारी व लेखपाल को नहीं दिखी, जोकि बड़ी लापरवाही मानी जा रही है। जांच एजेंसियां अब यह पता लगा रही हैं कि यह पीपीओ नंबर कहां से लिया गया और इसे दस्तावेजों में किसने दर्ज कराया।
उत्तर प्रदेश के रिकार्ड भी खंगाले जा रहे
उत्तराखंड के उपलब्ध रिकार्ड में पीपीओ नंबर का मिलान नहीं होने के बाद अब जांच का दायरा बढ़ाया जा रहा है। अधिकारियों की ओर से उत्तर प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानियों से जुड़े पीपीओ नंबरों और अभिलेखों का मिलान कराया जा रहा है।
इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि कहीं दूसरे राज्य के किसी वास्तविक स्वतंत्रता सेनानी के विवरण का इस्तेमाल तो नहीं किया गया। साथ ही यह भी जांचा जा रहा है कि दस्तावेजों में दिए गए नाम, पते, पीपीओ नंबर और अन्य विवरण आपस में मेल खाते हैं या नहीं।
एमबीबीएस तक सीमित नहीं हो सकता खेल
जांच के दौरान सामने आ रहे दस्तावेजों ने इस आशंका को भी बढ़ा दिया है कि कथित फर्जीवाड़ा केवल एमबीबीएस दाखिले तक सीमित नहीं रहा होगा। स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र का इस्तेमाल अन्य शैक्षणिक दाखिलों या सरकारी लाभ लेने के लिए भी किया गया है या नहीं, इसकी जांच की जा रही है।
जांच एजेंसियां ऐसे प्रमाणपत्रों के पुराने रिकार्ड भी खंगाल सकती हैं, ताकि यह पता चल सके कि एक ही तरीके से कितने लोगों को लाभ दिलाने का प्रयास किया गया।
दस्तावेजों की कड़ियां जोड़ने में जुटी जांच एजेंसी
मामले में गिरफ्तार आरोपितों के मोबाइल और अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरणों की जांच भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि फर्जी प्रमाणपत्र तैयार कराने, अभ्यर्थियों की पहचान जुटाने और दाखिले की प्रक्रिया में कौन-कौन लोग अलग-अलग भूमिका निभा रहे थे।
चार अभ्यर्थियों के लिए एक ही पीपीओ नंबर का इस्तेमाल और ताम्रपत्र में संबंधित स्वतंत्रता सेनानी का नाम नहीं होना जांच के लिए अहम कड़ी बन गया है। अब उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के रिकार्ड के मिलान के बाद ही फर्जीवाड़े का पूरा दायरा स्पष्ट हो सकेगा।
