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देहरादून, जेएनएन। उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय में अनियमितताओं का बोलबाला रहा है। पिछले एक अर्से से यहां नियम कायदों को ताक पर रखकर काम किए जाते रहे। कभी नियुक्तियां, कभी खरीद और कभी अन्य कारण विश्वविद्यालय चर्चाओं में रहा है। अब स्पेशल ऑडिट में इसकी पोलपट्टी खुल रही है। शुरुआती चरण में ही ऑडिट टीम ने कई आपत्तियां लगा दी हैं। जिस कारण अधिकारियों के भी हाथ पांव फूले हुए हैं। 

उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय को अस्तित्व में आए एक दशक बीत चुका है, पर विवि प्रशासन की कार्यशैली में सुधार नहीं आया है। यहां अब तक कई स्तर पर गड़बडिय़ां सामने आई है। पूर्व कुलसचिव डॉ. मृत्युंजय मिश्रा के निलंबन के बाद विवि में एक-एक कर कई अनियमितताओं पर से पर्दा उठता चला गया। जिस पर शासन ने स्पेशल ऑडिट कराने का निर्णय लिया है। हाल में ऑडिट चल रहा है। जिसमें बड़े स्तर पर खामियां सामने आ रही हैं। हालांकि अधिकारी इस पर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं।

विवि के कुलपति प्रो. अभिमन्यु कुमार का कहना है कि विवि का अब तक का ऑडिट किया जा रहा है। यह प्रक्रिया अभी चल ही रही है। ऐसे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। बता दें, इससे पहले विवि में नियुक्ति आदि पर भी विवाद रहा है। इनमें भी बड़े स्तर पर खामियां सामने आई हैं। हाल में नर्सिंग की भर्ती में तो मेरिट में आए अभ्यर्थियों को लिस्ट से ही बाहर कर दिया गया। 

सामने आई खामियां 

-कुल बिलों का आपत्तियां दरकिनार कर भुगतान। 

-विभिन्न विज्ञापित पदों के आवेदकों से लिए शुल्क का हिसाब गड़बड़। 

-निजी कॉलेजों के संबद्धता शुल्क के रिकॉर्ड में गड़बड़ी। 

-बस संचालन में ईंधन खर्च पर आपत्ति। 

-बिना स्वीकृति फंड्स का मद बदला गया। 

-एंबुलेंस के ईंधन खर्च में भी गड़बड़झाला। 

डिप्टी रजिस्ट्रार समेत 20 चिकित्साधिकारियों की संबद्धता समाप्त 

उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर व संघटक कॉलेजों से संबद्ध 20 आयुर्वेद चिकित्साधिकारियों का अटैचमेंट खत्म कर दिया गया है। कुलसचिव रामजी शरण शर्मा ने इन्हें मूल तैनाती स्थल के लिए एकतरफा कार्यमुक्त कर दिया है। इनमें डिप्टी रजिस्ट्रार डॉ. राजेश कुमार भी शामिल हैं। वे यहां काफी वक्त से समायोजन पर चल रहे थे। 

बता दें, आयुर्वेद विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर में प्रदेशभर से 54 आयुर्वेद चिकित्साधिकारी संबद्ध हैं। यह सभी उन दूरस्थ क्षेत्रों से संबद्ध किए हैं, जहां डॉक्टरों की भारी कमी है। आयुर्वेद विश्वविद्यालय के हर्रावाला, ऋषिकुल व गुरुकुल परिसर में फैकल्टी की कमी के कारण इन्हें आयुर्वेद चिकित्साधिकारियों को यहां संबद्ध किया गया था। सीसीआइएम के सामने इन्हीं के बूते संबद्धता संबंधी मानक पूरे किये जा रहे थे। पूर्व में भी इनकी कई बार संबद्धता समाप्त की गई, पर फैकल्टी की कमी को देखते हुए इन्हें पुन: बहाल कर दिया गया।

अब एक बार फिर इस ओर कार्रवाई की गई है। खास बात ये कि पहली ही लिस्ट में विवि के डिप्टी रजिस्ट्रार का भी नाम शामिल है। बहरहाल, संबद्धता समाप्त होने से विवि के संघटक कॉलेजों में एक बार फिर फैकल्टी की कमी हो जाएगी। पूर्व में भी छात्र इसे लेकर धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं। जिस पर यह निर्णय बदलना पड़ा था। एक तरफ मरीजों की पीड़ा है और दूसरी तरफ छात्रों का भविष्य। अब देखना ये होगा कि सरकारी तंत्र किसका दर्द समझता है। 

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Posted By: Raksha Panthari

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