देहरादून, जेएनएन। आइएमए से पासआउट कई कैडेट परिश्रम के ताप में तपकर कुंदन बने हैं। जीवन की चुनौतियों को उन्होंने अवसर समझा और सफलता की एक नई इबारत लिख दी। मध्य प्रदेश के भिंड निवासी कुलदीप सिंह इन्हीं में एक हैं। कुलदीप के पिता नायक भीम सिंह सेना की 25 मैकेनाइज्ड इंफेंट्री में तैनात थे। वर्ष 2002 में एक दुघर्टना में उनके पिता और मां की मृत्यु हो गई। उस वक्त कुलदीप कक्षा छह में अध्ययनरत थे। इस परिस्थिति में दो छोटी बहनें पूजा व पिंकी भी बेसहारा हो गई। तब उनके चाचा हवलदार महपत भदौरिया व सैन्य यूनिट के अफसर कुलदीप का सहारा बने। 

यूनिट के तत्कालीन कमान अधिकारी ले. कर्नल अरुण बहर ने कुलदीप की शिक्षा की व्यवस्था की। ग्रेजुएशन के दौरान वर्ष 2012 में कुलदीप बतौर सिपाही सेना में भर्ती हो गए और उसी 25 मैकेनाइज्ड इंफ्रेंट्री का हिस्सा बने। यहां पर यूनिट के कमान अधिकारी कर्नल तरुणेश ने कुलदीप को संबल दिया और एसीसी के लिए प्रेरित किया। पहले ही प्रयास में कुलदीप का चयन एसीसी में हो गया। शनिवार को आइएमए से प्रशिक्षण पूरा कर वह सेना में अपसर बन गए। इस अवसर पर यूनिट के पूर्व कमान अधिकारी कर्नल बहर व कर्नल तरुणेश भी पहुंचे थे।

पिता चलाते हैं चिकन शॉप, बेटा बना फौज में अफसर 

बिहार के सीतामणि के रहने वाले मोहम्मद कमरूल जमा भी विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए अपने लक्ष्य तक पहुंचे हैं। कमरूल के पिता गुलाम मुस्तफा सीतामणि में ही एक छोटी चिकन शॉप चलाते हैं। आय बहुत कम है और बमुश्किल गुजर बसर होती है। मां शामिना खातून गृहणी हैं। मुस्तफा ने खुद के खर्च सीमित कर बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दिया। सीतामणि हाईस्कूल से पढ़ाने करने के बाद कमरूल वर्ष 2012 में सेना में सिपाही बने। अपनी मेहनत के बूते 2015 में उनका चयन एसीसी में हो गया। उनकी पांच बहनें भी हैं। आइएमए से सैन्य प्रशिक्षण पूरा कर बेटे को अफसर बनता देख कमरूल के माता-पिता की आंखें छलक आईं। उनके पिता बताते हैं कि अपने बेटे की पढ़ाई के लिए उन्होंने दिन-रात मेहनत की और सालभर पहले ही मामूली धनराशि एकत्र कर एक छोटा सा घर बनाया है। 

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Posted By: Sunil Negi