जागरण संवाददाता, देहरादून : एक साधक में ज्ञान और वैराग्य दृष्टि का होना बेहद जरूरी है। इसका उपयोग ईश्वर के मनन में करना चाहिए। सृष्टि तो मूल से ही द्वंद्वमयी रही है और रहेगी। सृष्टि के परिवर्तनशील मकड़जाल से निकलकर मुक्त हो जाना चाहिए। 'मानस के चार घाट' विषय पर प्रवचन देते हुए श्री रामकिंकर विचार मिशन के परमाध्यक्ष संत मैथिलीशरण महाराज ने विचार व्यक्त किए।

बुधवार को सनातन धर्म सभा गीता भवन की ओर से सुभाष रोड स्थित चिन्मय मिशन में रामकथा ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन संत मैथिलीशरण महाराज ने कहा कि भगवान के प्रति भावना भक्तियोग, कर्म की भावना कर्मयोग और भगवान के लिए विचार करना ज्ञान योग है। उन्होंने कहा कि हम जैसे हैं, ईश्वर हमें वैसे ही स्वीकार कर लेंगे। मुक्ति के लिए सत्संग रूपी विवेक होना जरूरी है। कहा कि हनुमान जी में ज्ञान, भक्ति और कर्म के सारे के सारे गुण होते हुए भी उनमें कहीं भी कर्ता भाव का भाव नहीं था, यह उनकी शरणागति है। हनुमान जी का पर्वत के समान रूप धारण कर एक छलांग में समुद्र को पार करना उनका कर्मयोग है, जो उनके पूज्य राम के लिए समर्पित है।

वहीं मुक्त होते हुए भी भगवान के कार्य के लिए मेघनाद के नागपाश का बंधन स्वीकार कर लेना उनका भक्ति योग है। इसके अलावा सभी कार्य में अप्रत्यक्ष रूप से भगवान को ही देखना, यह उनका ज्ञान योग है। हनुमान जी का लंका से लौटकर भगवान से यह कहना कि मैंने कुछ नहीं किया, यदि जामवंत जी कह रहे हैं कि मैंने कुछ किया है, तो वह सब आपका प्रताप है। यह हनुमान जी की शरणागति है।

इस मौके पर दूसरे शहरों से भी श्रद्धालु महाराज के प्रवचन सुनने के लिए पहुंचे। भक्तिमय भजनों की प्रस्तुति पर श्रद्धालु भाव विभोर हो उठे। इससे पूर्व राकेश ओबराय, साधना जयराज ने महाराज का स्वागत किया।

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