विकास गुसाईं, देहरादून। प्रदेश में विधानसभा चुनाव निकट आते ही राजनीतिक दलों को फिर लोकायुक्त की याद सताने लगी है। विपक्षी दल इसे लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में जुटे हैं, तो लोकायुक्त अधिनियम फिलहाल विधानसभा की संपत्ति बना हुआ है। यह कानूनी रूप कब लेगा, भविष्य में ही पता चलेगा। दरअसल, उत्तराखंड में लोकायुक्त विधेयक वर्ष 2011 में पारित किया गया था। इसे राष्ट्रपति से भी मंजूरी मिल गई थी। इस बीच 2012 में सत्ता परिवर्तन हुआ और कांग्रेस ने फिर से इसमें संशोधन किया। इससे सरकार लोकायुक्त को नियत अवधि में नियुक्त करने की बाध्यता से मुक्त हो गई। वर्ष 2017 में भाजपा की सरकार आई और उसने भी इसमें कुछ संशोधन किए। सदन में विपक्ष की सहमति के बावजूद सरकार ने इसे प्रवर समिति को सौंप दिया। प्रवर समिति ने इस पर अपनी रिपोर्ट दे दी है, लेकिन इस विधेयक पर अभी तक अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है।

हाथियों की आवाजाही को नए गलियारे

प्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। मुख्य रूप से हाथी बस्तियों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण पारंपरिक गलियारों का बंद होना है। इन गलियारों में कहीं मानव बस्तियां आ गई हैं, तो कहीं सड़कें व रेल लाइन बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। परिणामस्वरूप गजराज के स्वच्छंद विचरण पर असर पड़ा और इसकी परिणति हाथी-मानव संघर्ष के रूप में देखने को मिली। इसे देखते हुए हाथियों के इन गलियारों को फिर से बनाने की बात कही गई। वर्तमान में हाथियों के आवागमन के 11 गलियारे चिह्नित किए गए हैं। इन गलियारों को दुरुस्त करने के लिए कई योजनाएं बनाई गईं। अभी स्थिति यह है कि मात्र एक योजना पर ही काम हो पाया है। शेष पर अभी तक कोई ठोस काम नहीं हुआ है। इससे हाथी व मानव संघर्ष की घटनाओं पर अंकुश नहीं लग पा रहा है।

कब अस्तित्व में आएगा फीस एक्ट

प्रदेश में रही कई सरकारों की प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर नकेल कसने की कवायद अभी तक परवान नहीं चढ़ पाई है। इसके लिए बने एक्ट को लागू करने में सरकार सफल नहीं हो पाई। आज भी अभिभावक प्राइवेट स्कूलों की मनमानी से जूझ रहे हैं। सरकार ने जब एक्ट बनाने की बात कही तो फीस के बोझ तले दबे अभिभावकों ने राहत की सांस ली। उन्हें लगा कि अब स्कूलों की मनमानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। फीस एक्ट में प्रविधान किए गए कि स्कूल सत्र से पहले फीस सार्वजनिक करेंगे और तीन साल तक इसमें कोई बढ़ोतरी नहीं कर सकेंगे। अभिभावकों को महसूस हुआ कि उन्हें स्कूलों की मनमानी से मुक्ति मिलेगी। इस इंतजार में पूरे चार साल गुजर चुके हैं। बीते वर्ष कोरोना के कारण अभिभावकों को थोड़ी राहत मिली थी। अब फिर से व्यवस्था बहाल हो रही है तो अभिभावकों की चिंता भी बढ़ रही है।

याद आया निकायों में 74वां संशोधन

निकायों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने और खुद के पैरों पर खड़ा करने के लिए बनाया गया 74वां संशोधन प्रदेश में लागू नहीं हो पाया है। इस अवधि में तीन महापौर बदल चुके हैं, चौथे कुर्सी पर हैं, मगर कोई भी इसे लागू करने को सरकार पर दबाव नहीं डाल पाया है। इससे निकाय आज भी अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार का मुंह ताक रहे हैं। दरअसल, निकायों के लिए बनाए गए 73 व 74वें संशोधन में निकायों को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इसके तहत म्यूटेशन से लेकर बिजली व पानी के बिल भी निकायों में जमा करने की व्यवस्था है। सरकार ने अभी निकायों को केवल मलिन बस्तियों के सुधार, नगरीय सुख सुविधा, जन्म-मरण सांख्यिकी व सार्वजनिक सुख सुविधाओं से संबंधित अधिकार ही दिए हैं। पूर्ण अधिकार हासिल न होने से निकायों की आर्थिकी मजबूत नहीं हो पा रही है।

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Edited By: Sunil Negi