जागरण संवाददाता, देहरादून। कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के बीच प्रदेश में ब्लैक फंगस ने भी दस्तक दे दी है। एम्स ऋषिकेश में इस बीमारी से एक मरीज की मौत होने के बाद हड़कंप की स्थिति है। दूसरी तरफ, ब्लैक फंगस जैसे फंगल इंफेक्शन के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाओं का दून समेत पूरे प्रदेश में बेहद सीमित स्टॉक है। इसकी वजह है सामान्य दिनों में ऐसी दवाओं की मांग बेहद कम होना। हालांकि, अब दून के केमिस्ट दवा कंपनियों को डिमांड भेज रहे हैं। प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग भी हरकत में आ गए हैं। अस्पताल व केमिस्ट से इन दवाओं की स्थिति का जायजा लिया जा रहा है।

होलसेल केमिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष मनीष नंदा ने बताया कि ब्लैक फंगस के उपचार में लाइपोसोमल एम्फोटेरिसन बी, फोसम-300, एम्फोटेरिसन बी कन्वेंशनल यानी सिंगल डोज (50 एमजी) इंजेक्शन का इस्तेमाल हो रहा है। इसके साथ ही कुछ मरीजों को पोसाकोनाजोल टेबलेट और सीरप भी दी जा रही है। सामान्य दिनों में मांग नहीं होने के कारण फिलहाल दून में इन दवाओं का स्टॉक सीमित है। इसके उलट इनकी मांग में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। हाल यह है कि सामान्य दिनों में जहां एक माह में फंगल इंफेक्शन के उपचार में इस्तेमाल होने वाले एक या दो इंजेक्शन की बिक्री होती थी। अब बीते दो दिन में 30 से ज्यादा लोग इंजेक्शन की डिमांड दे चुके हैं।

दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में होता है उत्पादन

मनीष नंदा ने बताया कि फिलहाल हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और गुजरात की कुछ फार्मा कंपनियां ही एंटी फंगल दवा का उत्पादन कर रही हैं। एकाएक मांग इतनी बढ़ गई है कि ये राज्य उसे पूरा नहीं कर पा रहे। दून से भी दिल्ली और हिमाचल प्रदेश की फार्मा कंपनियों को इन दवाओं की डिमांड भेजी जा चुकी है। हालांकि, इनकी आपूर्ति कब तक होगी, यह कहना अभी संभव नहीं है।

कालाबाजारी की भी आशंका

मांग बढ़ने और स्टॉक कम होने से रेमडेसिविर इंजेक्शन की तरह ब्लैक फंगस के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की भी कालाबाजारी की आशंका बढ़ गई है। एंटी फंगल इंजेक्शन एम्फोटेरिसन बी कन्वेंशनल यानी सिंगल डोज (50 एमजी) की कीमत 300 से 400 रुपये है। एम्फोटेरिसन लाइपोसोमल-बी छह से सात हजार रुपये में मिलता है। पोसाकोनाजोल टेबलेट की एक गोली 500 रुपये की है।

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