देहरादून, [जेएनएन]: कुमाऊं की होली में ब्रज और उर्दू का प्रभाव साफ झलकता है। मुगलों, राजे-रजवाड़ों के मेल-मिलाप से ये परंपरा बनी। कुमाऊं की होली गायकी को लोकप्रिय बनाने में जनकवि गिरीश तिवारी 'गिर्दा' का अहम योगदान रहा। यहां प्रचलित होली के तीन भेद बताए गए हैं। 

जैसे बैठ होली बैठकों में शास्त्रीय ढंग से गाई जाती है, तो खड़ी होली में ढोल-नगाड़ा होता है और पूरा समूह झोंक के साथ नाचता है। महिला होली इन दोनों का मिश्रित रूप है। इसमें स्वांग भी है, ठुनक-मुनक भी है और गंभीर अभिव्यक्तियां भी। लेकिन, सबसे ज्यादा जो दिखता है, वो है देवर-भाभी का मजाक। जैसे-'मेरो रंगीलो देवर घर ऐरों छो, कैं होणी साडी कैं होणी जंफर, मी होणी टीका लैंरो छो, मेरो रंगीलो देवर।' हालांकि समय के साथ पीढ़ियों से चली आ यह परंपरा अब कुछ सिमट सी गई है। 

शृंगार व दर्शन का उल्लास

गढ़वाल में जब होल्यार किसी गांव में प्रवेश करते हैं तो गाते हुए नृत्य करते हैं, 'खोलो किवाड़ चलो मठ भीतर, दरसन दीज्यो माई अंबे, झुलसी रहो जी। तीलू को तेल कपास की बाती, जगमग जोत जले दिन-राती, झुलसी रहो जी।' इष्ट देव व ग्राम देवता की पूजा के बाद होल्यार गोलाकार में नाचते-गाते हैं। यह अत्यंत जोशीला नृत्य गीत है, जिसमें उल्लास के साथ शृंगार का भी समावेश दिखाई देता है। ऐसा ही नृत्य-गीतेय शैली का एक भजन गीत है, जिसमें उल्लास के साथ मां भवानी की स्तुति की जाती है। 

यथा, 'हर हर पीपल पात, जय देवी आदि भवानी, कहां तेरो जनम निवास, जय देवी आदि भवानी।' शृंगार व दर्शन प्रधान यह गीत भी होली में प्रसिद्ध है, 'चंपा-चमेली के नौ-दस फूला, पार ने गुंथी हार शिव के गले में बिराजे।' शृंगार व उत्साह से भरे इस गीत में होल्यार ब्रज की होली का दृश्य साकार करते हैं। यथा-'मत मारो मोहनलाला पिचकारी, काहे को तेरो रंग बनो है, काहे की तेरी पिचकारी, मत मरो मोहन पिचकारी।' जब होल्यारों की टोली होली खेल चुकी होती है, तब आशीर्वाद वाला यह नृत्य-गीत गाया जाता है, 'हम होली वाले देवें आशीष, गावें-बजावें देवें आशीष।'

यह गीत भी हैं प्रसिद्ध

-ऐ गे बसंत ऋतु, ऐगेनी होली, आमू की डाली में कोयल बोली।

-उडिगो छो अबीर-गुलाल, हिमाला डाना लाल भयो, केसर रंग की बहार, हिमाला डाना लाल भयो।

-बांज-बुरांश का कुमकुम मारो, डाना-काना रंग दे बसंती नारंगी। 

-तुम विघ्न हरो महाराज, होली के दिन में।

-मुबारक हो मंजरी फूलों भरी, ऐसी होली खेलें जनाब अली।

-चंद्र्रबदन खोलो द्वार, कि हर मनमोहन ठाडे।

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Posted By: Sunil Negi