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जसपाल राणा ने पॉलिटिक्स में भी आजमाया हाथ, लेकिन निशानेबाजी का सितारा सियासत में चूका निशाना

Published: Sat, 13 Jun 2026 09:25 AM (IST)

अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज जसपाल राणा ने सियासत में हाथ आजमाया, लेकिन इसमें सफल नहीं हो पाए। उन्होंने 2009 में भाजपा से ...और पढ़ें

जसपाल राणा।

जसपाल राणा।

HighLights

  1. जसपाल राणा ने 2009 में भाजपा से टिहरी सीट पर चुनाव लड़ा

  2. 2012 में कांग्रेस में शामिल हुए, पर सक्रिय नहीं रहे

  3. सियासत से दूरी बनाकर खेल जगत में वापसी की

राज्य ब्यूरो, देहरादून। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतरीन निशानेबाजी से देश को अनेक गौरवपूर्ण पल देने वाले मशहूर निशानेबाज जसपाल राणा ने सियासत में भी हाथ आजमाया, लेकिन इसमें वह सटीक निशाना लगाने से चूक गए।

खेल के मैदान में विरोधियों को पस्त कर देने वाले राणा सियासत के दांव-पेच में खुद को स्थापित नहीं कर पाए और आखिरकार उन्होंने सियासत से दूरी बना ली थी।

भाजपा ने टिहरी सीट से बनाया था उम्मीदवार

निशानेबाज राणा ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत भाजपा से की। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन पर भरोसा जताते हुए टिहरी सीट से अपना उम्मीदवार बनाया। इस चुनाव में उनका मुकाबला कांग्रेस के तत्कालीन वरिष्ठ नेता और स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा के पुत्र विजय बहुगुणा से था।

सियासत के इस पहले बड़े इम्तिहान में जसपाल राणा को पराजय का सामना करना पड़ा। यह हार उनके राजनीतिक सफर के लिए बड़ा झटका साबित हुई। इससे उनका भाजपा से मोहभंग हो गया और वर्ष 2012 में उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा। यद्यपि, कांग्रेस में शामिल होने के बावजूद न तो उन्होंने कोई चुनाव लड़ा और न सक्रिय राजनीति में कोई बड़ी भूमिका निभाई।

समय के साथ राजनीति के प्रति उनकी उदासीनता खुलकर सामने आने लगी। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने राणा को अपने स्टार प्रचारकों में शामिल किया, लेकिन उन्होंने इससे साफ तौर पर इन्कार कर दिया। इसके बाद राजनीतिक गतिविधियों से उनकी दूरी लगातार बढ़ती चली गई।

आखिरकार, राणा ने सियासत से पूरी तरह किनारा कर लिया और वह किसी चुनावी अभियान, राजनीतिक मंच या दलगत गतिविधि में कहीं भी सक्रिय नजर नहीं आए। खेल जगत का यह चमकता सितारा सियासत की जटिलताओं में खुद को सहज महसूस नहीं कर पाया और उन्होंने अपनी मूल पहचान खेल और निशानेबाजी की दुनिया में लौटना ही बेहतर समझा।

निशानेबाजी में राणा ने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियां हासिल कीं, वहीं, सियासत में उनका सफर अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सका। उनका राजनीतिक अध्याय अक्सर एक ऐसे खिलाड़ी की कहानी के रूप में याद किया जाता है, जिसने खेल के मैदान में तो अनेक लक्ष्य भेदे, लेकिन सियासत के मैदान में सटीक निशाना नहीं लगा पाया।

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