विजय मिश्रा, देहरादून। देश के अन्य हिस्सों की तरह उत्तराखंड में भी कोरोना संक्रमण दोबारा पैर पसारने लगा है। अच्छी बात यह है कि अब हमारे पास वैक्सीन के रूप में इस महामारी से लड़ने के लिए एक हथियार है। प्रदेश में टीकाकरण को लेकर उत्साह के साथ जागरूकता भी नजर आ रही है। टीकाकरण अभियान में 45 साल से ऊपर के सभी व्यक्तियों को शामिल किए जाने के बाद हर टीकाकरण केंद्र में कतारें देखी जा रही हैं। यह अच्छा संकेत है। लेकिन, टीकाकरण केंद्रों के बाहर लग रही भीड़ चिंता बढ़ा रही है। टीकाकरण के उत्साह में लोग शारीरिक दूरी के नियम का ख्याल भी नहीं रख रहे। हमें यह समझना होगा कि वैक्सीन एहतियात भर है, आजादी नहीं। कोरोना से बचाव के लिए अब भी फेस मास्क का इस्तेमाल, आवश्यक शारीरिक दूरी का पालन, हाथों की साफ-सफाई बेहद जरूरी है। इसलिए दवाई के साथ भी ढिलाई नहीं बरतनी है।

व्यवस्था भी उत्कृष्ट करो सरकार

राज्य की सरकार का प्रयास है कि सरकारी विद्यालयों के बच्चों की भी अंग्रेजी पर पकड़ मजबूत हो जाए। मंशा अच्छी है। भावी पीढ़ी के लिए बेहद जरूरी भी। इतना ही जरूरी यह भी है कि नए सत्र में सरकारी शिक्षा पद्धति को नया स्वरूप देने जा रहे अंग्रेजी माध्यम के 190 माध्यमिक विद्यालयों (अटल उत्कृष्ट स्कूल) में नाम और शिक्षा के माध्यम की तरह व्यवस्था में भी बदलाव लाया जाए। ये स्कूल नए सत्र के लिए तैयार तो हैं, मगर यहां शिक्षकों की तैनाती अब तक नहीं हो पाई है। आधे से ज्यादा स्कूलों की मान्यता भी फिलहाल अधर में ही है। निश्चित ही गरीब पृष्ठभूमि में पली-बढ़ी मेधा के लिए अटल उत्कृष्ट स्कूल संजीवनी साबित हो सकते हैं। मगर, तब जब नाम की तरह इन स्कूलों की व्यवस्था भी उत्कृष्ट की जाए। तभी राज्य के हर बच्चे को गुणवत्तापरक शिक्षा देने की अवधारणा भी अटल स्वरूप धारण कर पाएगी। 

जिंदा मजबूर और मुर्दा मजदूर 

मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम। इससे 71 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड में ग्रामीण आबादी की आॢथकी को काफी संबल मिला है। खासकर, लॉकडाउन में बड़ी संख्या में प्रवासियों के लौटने के बाद। यह योजना मददगार प्रधानों की जेबें भरने में भी साबित हुई है। रोजगार के फर्जी आंकड़े दिखाकर बजट डकारने की खबरें आम हो चुकी हैं। पौड़ी जिले के खिर्सू ब्लॉक की पोखरी ग्राम पंचायत के प्रधान ने तो मनरेगा का बजट डकारने के लिए मुर्दे को भी जिंदा दिखाने से परहेज नहीं किया। मामला वर्ष 2017 का है। पर्दाफाश अब जाकर हुआ है। वो भी सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में। इस भ्रष्टाचार के लिए दोषी भले ग्राम प्रधान हो, मगर जिम्मेदार प्रशासन भी कम नहीं है। निगरानी दुरुस्त हो तो ऐसी अनियमितता को रोका जा सकता है। बस, इसके लिए अधिकारियों को एसी वाले कमरे का मोह त्यागना होगा।

कामकाज में ही मिलावट है

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। रामायण की इस चौपाई का भावार्थ यह है कि वही होगा, जो राम ने रच रखा है। खाद्य संरक्षा एवं औषधि विभाग ने भी प्रदेशवासियों की सेहत को इसी तर्ज पर भगवान भरोसे छोड़ रखा है। रिकॉर्ड दुरुस्त करने के लिए त्योहारों पर खाद्य पदार्थों की सैंपलिंग में तो विभाग हिरण की तरह कुलांचे भरता है, मगर रिपोर्ट की बारी आने पर महकमे की चाल कुछआ से भी धीमी हो जाती है। गत वर्ष होली में लिए गए 73 नमूनों में भी अब तक 26 की रिपोर्ट ही मिल पाई है। बात दीपावली की करें तो 62 नमूनों में से किसी की भी रिपोर्ट नहीं मिली। सरकार को इस मसले पर ठोस कदम उठाने चाहिएं। लैब की कार्यप्रणाली सुधारने के साथ ही खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की पर्याप्त व्यवस्था की जानी चाहिए। इससे भी जरूरी है कि मिलावटखोरी को लेकर अधिकारियों की जवाबदेही तय करना।

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