देहरादून, सुमन सेमवाल। अगस्त में जिस क्यूआरसैम मिसाइल का सफल परीक्षण ओडिशा के बालासोर क्षेत्र में किया गया, उसका निशाना अब अचूक बनाया जा सकेगा। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) के देहरादून स्थित यंत्र अनुसंधान एवं विकास संस्थान (आइआरडीई) ने इस मिसाइल के लिए लेजर प्रॉक्सिमिटी फ्यूज तैयार किया है। जल्द इसे मिसाइल में फिट कर दिया जाएगा। आइआरडीई में ऑप्टिक्स और इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स विषय पर चल रहे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में रक्षा विशेषज्ञों के समक्ष महज 2.7 किलोग्राम के इस फ्यूज का प्रदर्शन किया गया।

आइआरडीई के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. पुनीत वशिष्ठ ने बताया कि अभी देश की मिसाइलों में दुश्मन के एयरक्राफ्ट व किसी भी टोही विमान को पकड़ने के लिए रेडियो तरंगों वाले फ्यूज का प्रयोग किया जाता है। कई दफा ये तरंगें अलग-अलग दिशा से आने वाले एयरक्राफ्ट को पकड़ने में असफल रहती हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए लेजर तरंग आधारित फ्यूज के अनुसंधान एवं विकास की दिशा में काम शुरू किया गया। दो साल के गहन अनुसंधान के बाद अब इस फ्यूज को तैयार कर लिया गया है। जल्द कुछ और ट्रायल के बाद इसका उपयोग किया जा सकेगा।

इस तरह मिसाइल का टारगेट बनेगा अचूक

आइआरडीई के एसोसिएट डायरेक्टर के अनुसार मिसाइल में फिट होने के बाद लेजर प्रॉक्सिमिटी फ्यूज से 5000 पल्स प्रति सेकंड की दर से तरंगें निकलेंगी। जो कि टारगेट किए गए एयरक्राफ्ट की निगरानी करेंगी। तरंगें यह संकेत भेजेंगी कि टारगेट कितनी दूरी पर है और उसकी रफ्तार कितनी है। इस सबका आकलन एक सेकंड के हजारवें भाग के भीतर कर लिया जाएगा। इसके लिए फ्यूज के भीतर फील्ड प्रोगामेबल गेट आर्रे (एफपीजीए) चिप लगाई गई है। आकलन के साथ ही टारगेट के 20 मीटर की परिधि में आते ही मिसाइल उसे शूट कर देगी।

सिर्फ तीन देशों के पास ही तकनीक

अभी मिसाइल की टारगेट क्षमता को अचूक बनाने की यह तकनीक सिर्फ तीन देशों के पास ही है। इनमें अमेरिका, फ्रांस व रूस शामिल हैं। अब भारत भी इस क्षमता से लैस हो गया है।

10 करोड़ के वेपन जांच सिस्टम को एक करोड़ में बनाया

रक्षा उत्पादों की प्रदर्शनी में टी-90 टैंक के वेपन की जांच का एक ऐसा सिस्टम भी आकर्षण का केंद्र बना रहा, जो न सिर्फ स्वदेशी है, बल्कि उसकी लागत भी पहले की अपेक्षा महज 10 फीसद है। अब तक टी-90 टैंक के वेपन सिस्टम व अन्य तरह के फॉल्ट की जांच के लिए जो सिस्टम जोड़ा जाता है, उसकी लागत करीब 10 करोड़ रुपये आती है। इसे भी रूस से मंगाया जाता है। हालांकि, अब आइआरडीई ने स्वदेशी तकनीक पर आधारित सिमुलेटेड टेस्ट एंड इंटेरोगेटर किट (एसटीआइके) तैयार कर ली है और इसकी लागत महज एक करोड़ रुपये आ रही है। रूस के सिस्टम की अपेक्षा यह अधिक हल्का और उच्च तकनीक पर भी आधारित है। सेना की मांग के आधार पर इसकी 37 यूनिट तैयार करने का काम भी शुरू कर दिया गया है।

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टी-90 टैंक की नजर घुप्प अंधेरे में देखेगी साफ

अब टी-90 टैंक की नजर घुप्प अंधार में भी दुश्मन को पकड़ लेगी। इसके लिए यंत्र अनुसंधान एवं विकास संस्थान (आइआरडीई) ने टैंक की उन्नत किस्म की ड्राइवर व कमांडर साइट तैयार की है। खास यह कि भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लि. (बेल) व देहरादून स्थित ऑप्टो इलेक्ट्रॉनिक्स फैक्ट्री (ओएलएफ) को 3700 यूनिट तैयार करने का ऑर्डर भी दे दिया गया है।

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आइआरडीई के विशेषज्ञों ने बताया कि अब तक की साइट चांदनी रात में भी बेहतर काम करती थी और धुंध व अंधेरी रात में इसका प्रदर्शन कमजोर हो जाता था। वहीं, ड्राइवर साइट पर बैठे व्यक्त के लिए टैंक चलाना बेहद मुश्किल हो जाता था। लिहाजा, नई साइट में फ्यूजन तकनीक का प्रयोग किया गया है। इस तकनीक में कमांडर साइट पर पांच किलोमीटर तक की दूरी पर बैठे दुश्मन की हर हलचल पर नजर रखी जा सकती है, जबकि ड्राइवर साइट पर 200 मीटर की दूरी पर स्पष्ट देखा जा सकता है। इस तकनीक से टैंक के सामने की हलचल को स्क्रीन पर देखा जा सकता है। वहीं, पुरानी तकनीक में टैंक चलाने वाले जवानों को डिवाइ पर आंख को चिपकाकर लगाना पड़ता है। इसकी एक और खासियत यह है कि माइनस 40 डिग्री व उच्च तापमान में 55 डिग्री सेल्सियस तक ये साइट बखूबी काम करती हैं।

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Posted By: Sunil Negi

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