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'हाथी मेरा साथी' अब बन बैठा 'जानी दुश्मन', 25 साल में 8806 लोगों की मौत

Published: Thu, 01 Oct 2026 01:30 PM (IST)

भारतीय वन्यजीव संस्थान के अध्ययन के अनुसार, 2000 से 2025 के बीच मानव-हाथी संघर्ष में 2,273 हाथियों और 8,806 लोगों की जान गई है।

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सुमन सेमवाल, देहरादून। ''हाथी मेरा साथी'' की कहावत अब ''जानी दुश्मन में बदलती दिख रही है। आठ राज्यों में मानव-हाथी संघर्ष में 2,273 हाथियों ने अपनी जान गंवा दी। मौत के कारणों में बिजली का करंट प्रमुख रहा।

भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) के ताजा शोध में आठ राज्यों में वर्ष 2000 से 2025 के बीच हाथियों की 7,850 मौतों का अध्ययन किया गया। इसमें पता चला कि 2,273 मौतें मानवजनित थीं। इनमें सबसे बड़ा कारण बिजली का करंट रहा।

अध्ययन में असम, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बंगाल, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।

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प्रतिशोध बना हाथियों के काल का कारण

शोध के अनुसार इस अवधि में 8,806 व्यक्तियों ने भी हाथियों के हमले में जान गंवाई, जबकि 3,608 लोग घायल हुए। हाथियों के हमलों में 4,057 व्यक्तियों की मौत गांवों और उसके आसपास के क्षेत्रों में हुईं। पाया गया कि मनुष्य की मौतों के प्रतिशोध में भी हाथियों को निशाना बनाया गया।

बिजली के करंट से 1,168 हाथी मरे

अध्ययन के अनुसार बिजली करंट से 1,168 हाथियों की मौत हुई, जो मानवजनित मौतों का 51.4 प्रतिशत है। इसके बाद शिकार से 299 और ट्रेन की टक्कर से 251 हाथियों की मौत हुई। ये तीनों कारण मिलकर मानवजनित हाथी मौतों का 75.6 प्रतिशत रहे।

अध्ययन में संघर्ष के स्थायी और बदलते स्वरूप का भी पता चला। वर्ष 2000 से 2025 के बीच मानव मौतों वाले 37 गांव और हाथी मौतों वाले 10 गांव स्थायी संघर्ष हाटस्पाट रहे। वहीं 1,656 गांव मानव मौतों और 379 गांव हाथी मौतों के उभरते हाटस्पाट के रूप में सामने आए।

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संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डा. बिलाल हबीब के अनुसार संघर्ष के स्थायी केंद्रों के आसपास इसकी सीमाएं बदलती रहती हैं। इसलिए फेंसिंग स्थानीय स्तर पर मदद कर सकती है, लेकिन यह वास्तविक समाधान नहीं है। संघर्ष रोकने के लिए जागरूकता के साथ ही वन और वन्यजीव प्रबंधन की दिशा में दीर्घकालिक उपाय किए जाने चाहिए।