मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

देहरादून, राज्य ब्यूरो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सीमांत गांवों के विकास को प्राथमिकता देने और उनकी पीड़ा को समझने के बयान ने उत्तराखंड के सीमांत गांवों में भी आशा की किरण जगाई है। कारगिल विजय दिवस पर प्रधानमंत्री के इस उद्बोधन के बाद सीमा के अघोषित प्रहरी के रूप में बसे गांव और द्वितीय पंक्ति की सुरक्षा के रूप में तैनात रहने वाले ग्रामीण अब विकास कार्यों के तेजी पकडऩे और आधारभूत सुविधाओं को मिलने की उम्मीद कर रहे हैं। माना यह भी जा रहा है कि प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद मसूरी में रविवार को हो रहे हिमालयन कॉन्क्लेव में सीमांत गांवों पर गंभीरता से मंथन होगा। 

 उत्तराखंड राज्य की सीमाएं चीन और नेपाल की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से मिलती है। उत्तराखंड से चीन की 350 किमी लंबी और नेपाल की 275 किमी लंबी सीमा सटी हुई है। अंतर्राष्ट्रीय सीमा से सटे गांव सामरिक दृष्टि से बेहद अहम माने जाते हैं। वहां के ग्रामीण द्वितीय रक्षा पंक्ति के अघोषित सैनिक के रूप में देखे भी जाते हैं। कई मौकों पर सीमांत गांवों में रहने वाले ग्रामीण इस बात को साबित कर चुके हैं। यहां तक कि कारगिल में पाकिस्तानी सेना के घुसने की खबर भी ग्रामीणों ने भारतीय सेना को दी थी। 

बात करें उत्तराखंड की तो यहां की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के चलते सीमांत गांव अभी तक विकास की बाट जोह रहे हैं। आधारभूत सुविधाओं के अभाव में अब ये गांव तेजी से खाली हो रहे हैं। पलायन आयोग ने भी चीन सीमा से सटे ऐसे 14 गांव चिह्नित किए, जो पूरी तरह खाली हो चुके हैं। इसके अलावा 12 गांव ऐसे चिह्नित किए गए, जहां बीते कुछ वर्षों में 50 फीसद से अधिक लोग पलायन कर चुके हैं। राज्य सरकार ने भी इस स्थिति को चिंताजनक माना था और इन गांवों से पलायन रोकने और बेहतर आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए कार्ययोजना बनाने की बात कही गई थी।

हाल ही में मुख्य सचिव ने भी अपने पिथौरागढ़ दौरे में इन क्षेत्रों का जायजा लिया था। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन गांवों के दर्द को समझा और इनका जिक्र किया है। उन्होंने कहा है कि वे इन गांवों की पीड़ा को समझते हैं और सीमा के गांवों के विकास को प्राथमिकता देंगे। प्रधानमंत्री का यह बयान उत्तराखंड राज्य के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। इससे गांवों में विकास की गति पकड़ने की उम्मीद भी जगी है। 

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Posted By: Sunil Negi

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