देहरादून, जेएनएन। नागरिकता संशोधन विधेयक (कैब) का भले ही विपक्ष विरोध कर रहा हो, लेकिन पाकिस्तान से आकर उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में रह रहे शरणार्थी हिंदू परिवारों के चेहरों पर मुस्कान साफ झलक रही है। इन परिवारों को उम्मीद है कि अब उन्हें भारत की नागरिकता के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा और यहां भारतीय नागरिकों की तरह सम्मानजनक जीवन यापन कर सकेंगे।

पाकिस्तान के सिंध प्रांत स्थित खैरा इलाके के मूल निवासी लक्ष्मण शर्मा को बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने की छटपटाहट वर्ष 2012 में भारत खींच लाई थी। तब से लक्ष्मण पत्नी व पांच बच्चों के साथ हरिद्वार के गुरुकुल कांगड़ी विद्यालय परिसर में रह रहे हैं। उनका बड़ा बेटा इंटर, छोटा नवीं और तीनों बेटियां पांचवीं कक्षा में पढ़ रही हैं। 

उर्दू व पत्रकारिता में एमए लक्ष्मण उर्दू अखबार के लिए लिखकर अपने परिवार की गुजर करते हैं। बकौल लक्ष्मण अभी तक भारतीय नागरिकता के लिए दो शर्तें लागू होती हैं। या तो शरणार्थी ने लगातार 11 साल भारत में बिताए हों अथवा उसके पिता का जन्म वर्ष 1947 से पहले हुआ हो। 

उन्होंने कहा कि मेरे पिता का जन्म भी वर्ष 1946 में अविभाजित भारत के सिंध प्रांत में हुआ था। इसलिए दूसरी शर्त के सहारे लॉन्ग टर्म वीजा पर मेरे परिवार ने अभी तक का वक्त गुजारा। इस अवधि में हमने जो कठिनाइयां झेलीं, उन्हें सिर्फ महसूस किया जा सकता है। अब लगता है कि पाक शरणार्थी ङ्क्षहदुओं के अच्छे दिन यकीनन आ गए हैं।

लक्ष्मण कहते हैं कि पाक से आए शरणार्थी हिंदुओं के लिए नागरिकता संशोधन बिल किसी त्योहार से कम नहीं है। धर्म के नाम पर पाकिस्तान में ङ्क्षहदुओं को अनगिनत कष्ट मिलते हैं, इसलिए वह सिर्फ भारत की ओर देखते हैं। भारत के अलावा दुनिया में ऐसा कोई मुल्क नहीं, जो पाक हिंदुओं के लिए मुफीद हो। कहते हैं, अब नए कानून के अस्तित्व में आने से उन जैसे हजारों परिवारों का जीवन आसान हो जाएगा।

धरोहर सहेजने में निभाई अहम भूमिका

लक्ष्मण शर्मा ने शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव की फांसी से जुड़े ट्रायल के एतिहासिक दस्तावेजों को सहेजने में अहम भूमिका निभाई। वर्ष 2006 में धार्मिक यात्रा पर हरिद्वार आने के दौरान लक्ष्मण शर्मा की मुलाकात गुरुकुल कांगड़ी विवि के तत्कालीन कुलपति स्वतंत्र कुमार से हुई। उनके बुलावे पर स्वतंत्र कुमार वर्ष 2009 में पाकिस्तान गए। 

वहां उनकी भेंट पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस खलीलुर्रहमान रम्दे से हुई। स्वतंत्र कुमार ने भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु की फांसी वाली जगह देखने की इच्छा जताई तो खलीलुर्रहमान ने फांसी का ट्रायल सुरक्षित रखा होने की जानकारी दी। यह भी बताया कि ट्रायल लेने के लिए भारत सरकार कई बार आवेदन कर चुकी है। 

(फोटोः लक्ष्मण)

कठिन प्रयासों से ट्रायल की कॉपी हरिद्वार आने पर लक्ष्मण ने 1659 पेजों का उर्दू से हिंदी में अनुवाद किया। गुरुकुल के संग्रहालय में ट्रायल का डिजिटल मॉडल रिलीज होने पर वर्ष 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने लक्ष्मण शर्मा को सम्मानित भी किया।

जबरन धर्म परिवर्तन कराते हैं दरिंदे

11 साल पहले पाकिस्तान के बट्टाग्राम जिले से आईं कविता शर्मा कहती हैं कि वहां दङ्क्षरदे हर रोज हिंदू परिवारों को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करते थे। इसका उनके ताऊ जगदीश ने विरोध किया तो दरिंदों ने परिवार के सामने ही उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया। 

इसके बाद उनके पिता प्रीतम शर्मा, मां संतोखी, भाई जागेंद्र व सोनू और बहन काजल, मीना व उन्हें लेकर इस्लामाबाद से टूरिस्ट वीजा पर भारत आ गए। वे सीधे देहरादून पहुंचे, लेकिन वहां उन्हें कई दिन तक भटकते हुए गुजारने पड़े। लोगों को व्यथा सुनाई तो मेंहूवाला के कई लोगों ने उनकी मदद करते हुए ऋषि विहार में रहने को जगह दे दी। 

(फोटोः कविता) 

इसके बाद उनके परिवार ने मजदूरी करना शुरू कर दिया। 30 अक्टूबर 2014 को उनकी शादी रुड़की के सालियर निवासी सौरभ शर्मा के साथ हुई। उनके दो बेटे भी हैं। कविता ने बताया कि उनका न तो राशन कार्ड बना है न आधार कार्ड ही। वोटर लिस्ट में भी उनका नाम नहीं है। अब नागरिकता संशोधन विधेयक पास होने से वह खुश हैं। उनको भी वह सारी सुविधाएं मिलने वाली हैं, जो भारतीय नागरिकों को मिल रही हैं। 

हरिद्वार जिले में कुल 16 पाकिस्तानी हिंदू

हरिद्वार जिले में शरणार्थी पाक हिंदुओं की संख्या 16 है। यह सभी तीन परिवारों के सदस्य हैं। एक परिवार के दो सदस्यों को नागरिकता मिल भी चुकी है। लक्ष्मण शर्मा व एक अन्य परिवार ने नागरिकता के लिए आवेदन किया हुआ है। इसके अलावा पाकिस्तानी मूल के नौ मुस्लिम भी इस समय लॉन्ग टर्म वीजा पर हरिद्वार जिले में रह रहे हैं।

हसमत को मिलेगी नंदकिशोर के रूप में मूल पहचान

वर्ष 1946 में देवरिया जिले (उत्तर प्रदेश) के ग्राम निजामबाद निवासी नंदकिशोर जब पांच साल के थे, तब गांव के ही जमींदार अब्दुल कादिर उन्हें अपने साथ पाकिस्तान ले गए। वहां नंदकिशोर का नाम हसमत अली रख दिया गया। कुछ साल बाद जब नंदकिशोर को वतन की याद आई तो अब्दुल ने हसमत अली नाम से एक साल के वीजा पर वर्ष 1974 में उन्हें भारत भेज दिया। 

नंदकिशोर वीजा अवधि पूरी होने पर भी पाकिस्तान नहीं लौटे और ऊधमसिंहनगर जिले के नारायणपुर रुद्रपुर कोठा चले आए। यहां उन्होंने देवांती के साथ शादी की। उनके चार बेटे और दो बेटियां हैं, जबकि बहू फूलजरी करीब 20 साल पहले गांव की प्रधान भी बन चुकी है। परिवार में सभी को नागरिकता मिल गई, लेकिन नंदकिशोर इससे महरूम रहे। इसके लिए अभी तक वह 25 बार वीजा अवधि बढ़वा चुके हैं। 

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इस बीच वर्ष 2002 में उन्हें निर्वासित करने की प्रक्रिया भी शुरू हुई, लेकिन फिर तत्कालीन सरकार ने उन्हें राहत दे दी। अब नागरिकता संशोधन बिल ने 81-वर्षीय नंदकिशोर के साथ उनके स्वजनों के चेहरों पर भी खुशी ला दी है। उन्हें उम्मीद है कि अब हसमत अली की बजाय नंदकिशोर के नाम से देश में अंतिम सांस ले सकेंगे।

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Posted By: Bhanu

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