जलवायु परिवर्तन से हिमालयी पक्षी तोड़ रहे ऊंचाई की सीमाएं, गंगोत्री लैंडस्केप मेंसामान्य सीमा से ऊपर मिली 26 प्रजातियां
भारतीय वन्यजीव संस्थान के एक अध्ययन में सामने आया है कि हिमालयी पक्षी जलवायु परिवर्तन के कारण अपनी दर्ज ऊपरी ऊंचाई सीमा से अधिक ऊंचाई पर उड़ रहे हैं।


समय कम है?
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सुमन सेमवाल, देहरादून। हिमालय में पक्षियों की मौजूदगी को लेकर अब तक इस्तेमाल किए जा रहे विज्ञानी आंकड़ों पर भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) के नए अध्ययन ने महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। गंगोत्री लैंडस्केप में किए गए कैमरा ट्रैप अध्ययन में 55 पक्षी प्रजातियों की 551 स्वतंत्र रिकार्डिंग मिलीं।
जिसमें 26 प्रजातियों की कम से कम एक रिकॉर्डिंग उनकी प्रकाशित ऊपरी ऊंचाई सीमा से अधिक मिली। कुल 137 रिकॉर्डिंग ऐसी थीं, जो संबंधित पक्षियों की पहले दर्ज ऊंचाई सीमा से बाहर थीं। ऐसे में यह माना जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में पक्षियां अधिक ठंडक पाने के लिए हदों को तोड़ रही हैं।
यह शोध अनुज जोशी, विनीत के दुबे, रंजना पाल, संबंदम सत्यकुमार और जेए जानसन ने किया, जो भारतीय हिमालय में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की निगरानी से जुड़े राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन के दूसरे चरण का हिस्सा है। अध्ययन में 2500 से 5200 मीटर की ऊंचाई वाले गंगोत्री क्षेत्र को शामिल किया गया।
कुल 228 कैमरा स्टेशन लगाए गए और 43436 कैमरा-रात्रि का आंकड़ा जुटाया गया। पता चला कि 26 प्रजातियां अपनी अधिकतम सीमा से ऊपर मिलीं। इनमें 14 प्रजातियां एक से अधिक कैमरा स्टेशनों पर अपनी दर्ज सीमा से ऊपर रिकॉर्ड हुईं।
सबसे बड़ा अंतर 3287 मीटर
अध्ययन में किसी पक्षी की दर्ज मौजूदगी और उसकी पहले प्रकाशित ऊपरी ऊंचाई सीमा के बीच अधिकतम अंतर 3287 मीटर रहा। यह अध्ययन का सबसे बड़ा ऊंचाई संबंधी अंतर है।
उत्तराखंड में तीन हिमालयी पक्षियों की रेंज ने सर्वाधिक चौंकाया
कैमरा ट्रैप सर्वेक्षण के आधार पर विशेषकर तीन पक्षियों के वितरण क्षेत्र के विस्तार के रिकार्ड अधिक चौंकाने वाले हैं। इनमें पश्चिमी ट्रैगोपैन (मोनाल जैसा रंगीन तीतर), तिब्बती स्नोकॉक (तिब्बती हिम तीतर) और तिब्बती सैंडग्राउज शामिल हैं। अध्ययन में पश्चिमी ट्रैगोपैन का विस्तार गोविंद राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्यजीव विहार तक माना जाता था।
नए कैमरा ट्रैप रिकार्ड में इसकी उपस्थिति गंगोत्री के अधिक उच्च क्षेत्रों तक पुष्ट हुई है। वहीं तिब्बती स्नोकॉक (तिब्बती हिम तीतर) और तिब्बती सैंडग्राउज को मुख्य रूप से लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों से जोड़ा जाता रहा है। कैमरा ट्रैप ने उत्तराखंड में दोनों प्रजातियों की मौजूदगी का विज्ञानी दस्तावेज उपलब्ध कराया है।
भागीरथी नदी बेसिन के गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान में करीब 3500 मीटर की ऊंचाई पर छोटे उल्लू (लिटिल आउल) की उत्तराखंड में भी पहली बार तस्वीरों के माध्यम से पुष्टि की गई। इन अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि ऊंचे हिमालय में व्यवस्थित कैमरा ट्रैप निगरानी से पक्षियों के वास्तविक वितरण की ऐसी जानकारियां सामने आ रही हैं, जो पारंपरिक पक्षी सर्वेक्षणों में दर्ज नहीं हो पाती थीं।
