देहरादून, [केदार दत्त]: 'हम सबको कोशिश करनी चाहिए कि हर दिन एक अच्छा काम करें। छोटे से छोटा काम भी अच्छा होता है। लेकिन, बड़ा कार्य करने की होड़ में हम छोटे-छोटे कार्यों को नजरंदाज कर देते हैं। हालांकि बड़े काम सबकी नजर में आ जाते हैं, लेकिन छोटे कार्य भी पैनी नजर वालों की दृष्टि से छुपे नहीं रहते। छोटे-छोटे कार्य आपकी सोच की गहराई को प्रदर्शित करते हैं।' यह पैगाम है देश के उन हजारों बच्चों की बड़ी बहन सुधा दीदी का, जो 'हिमालयी बच्चों का अखबार' के जरिये उनसे जुड़े हैं। विज्ञान व वैज्ञानिक पहलुओं के साथ ही विभिन्न विषयों से बच्चों को रूबरू कराकर उनकी समझ विकसित करने की हेस्को संस्था की यह मुहिम पिछले 22 सालों से बदस्तूर जारी है। हाथ से तैयार होने वाले इस द्विमासिक बाल अखबार से वर्तमान में उत्तराखंड सहित नौ राज्यों के बच्चे जुड़े हुए हैं।

बच्चों के अखबार ने ऐसे लिया जन्म

उत्तराखंड समेत हिमालयी राज्यों के गांवों की तरक्की के लिए कार्य कर रही संस्था हिमालयी पर्यावरण अध्ययन एवं संरक्षण संगठन (हेस्को) जब चमोली जिले के गौचर क्षेत्र में कार्य कर रही थी, तभी हेस्को के संस्थापक पद्मश्री डॉ.अनिल प्रकाश जोशी का ध्यान गांवों के बच्चों की तरफ गया। फिर शहरी क्षेत्रों के बच्चों की तरह गांवों के बच्चों की समझ विकसित करने पर मंथन हुआ। डॉ.जोशी बताते हैं कि यह निकलकर सामने आया कि बच्चों का भी अखबार होना चाहिए। यह हस्तलिखित हो और इसमें गांवों के बच्चे भी भागीदारी करें।

वर्ष 1994 में पहली बार हस्तलिखित अखबार तैयार किया गया। इसे नाम दिया गया 'हिमालयी बच्चों का अखबार।' जब यह बच्चों के बीच गया तो उनका जबरदस्त उत्साहवर्द्धन मिला। इसके बाद 1996 से यह निरंतर निकल रहा है। पहले यह मासिक निकलता था, मगर दस साल पहले इसे द्विमासिक कर दिया गया। साथ ही पृष्ठों की संख्या चार से बढ़ाकर आठ कर दी गई। तब से यह निरंतर निकल रहा है और इसका मुख्यालय मियांवाला देहरादून कर दिया गया है। पिछले 21 साल से इसके संपादक का दायित्व निभा रही हैं हेस्को से जुड़ीं डॉ.सुधा कबटियाल।

रोचक रहा है अब तक का सफर

डॉ.सुधा बताती हैं कि 1997 में अखबार को लेकर बच्चों की जबर्दस्त प्रतिक्रिया देखने को मिली। बच्चों ने चिट्ठियां भेजकर अपनी अभिरुचि के बारे में जानकारी देने के साथ ही लगातार सुझाव भेजे। साथ ही वे चुटकुले, क्षेत्र की समस्याएं व प्रमुख स्थलों के बारे में जानकारी भेजने लगे। यही नहीं, विज्ञान और पर्यावरण से जुड़े मसले उनकी पहली पसंद के रूप में सामने आए। इसी के अनुरूप अखबार में बदलाव भी किए गए। कुछ समय तक बच्चों को बतौर प्रतिनिधि बनाकर उन्हें आइकार्ड भी जारी किए गए। बाद में सभी बच्चों को संवाददाता मान लिया गया। डॉ.सुधा के अनुसार अखबार के जरिये बच्चों को विज्ञान व तकनीकी के साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण समेत विविध विषयों पर लगातार जानकारी दी जाती रही। हालांकि, वित्तीय संसाधनों की कमी को देखते हुए अखबार को द्विमासिक करना पड़ा, मगर बच्चों का उत्साह लगातार बना हुआ है।

नौ राज्यों के बच्चे हैं 'रिपोर्टर'

बच्चों के इस अखबार से न सिर्फ उत्तराखंड, बल्कि मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर व हिमाचल प्रदेश के हजारों बच्चे जुड़े हुए हैं। इन राज्यों के तमाम गांवों के बच्चों को यह अखबार भेजा रहा है और वे भी अपनी अभिरुचि के अनुसार सामग्री भेजते हैं। कुछ समय पूर्व तक पूर्वोत्‍तर के राज्यों में भी एक संस्था के जरिये अखबार भेजा जाता था, मगर बाद में कतिपय कारणों से इसे बंद कर दिया गया। अब इस दिशा में फिर से प्रयास किए जा रहे हैं। 

ऐसे होती है नेटवर्किंग

डॉ.सुधा बताती हैं कि बच्चों को इस अखबार से जोडऩे के लिए आसान तरीका अपनाया गया है। जिस बच्चे को अखबार भेजा जाता है, उससे यह आग्रह भी किया जाता है कि वह अपने पांच दोस्तों को भी इसकी जानकारी देने के साथ उनके पते भी उपलब्ध कराए। इसी के आधार पर बच्चों को अखबार भेजा जाता है।

रोचक जानकारी के जरिये ज्ञानवर्द्धन

बच्चों को विज्ञान से जोड़कर इसके विविध पहलुओं के बारे में जानकारी देना 'बच्चों के अखबार' का मुख्य ध्येय है। इसीलिए अखबार में 'विज्ञान के चमत्कार' कॉलम अनिवार्य रूप से दिया जाता है। इसके अलावा पर्यावरण, खोजू भाई, खबरें इधर-उधर की, कविता, चुटकले, साफ-सफाई, फल-सब्जियों का महत्व समेत कई विषयों पर जानकारी दी जाती है। यही नहीं, बाल अधिकारों के साथ ही सूचना का अधिकार, चाइल्ड हेल्प लाइन जैसे तमाम विषयों पर भी जानकारी साझा की जा रही है।

जीवनदायिनी गंगा पर है फोकस

वर्तमान में इस मुहिम को भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) का संबल मिला है। डॉ.सुधा बताती हैं कि इन दिनों बच्चों का अखबार गंगा पर फोकस है और इसमें राष्ट्रीय नदी गंगा को लेकर बच्चों के ज्ञानार्जन में वृद्धि का प्रयास किया जा रहा है।

हजारों बच्चों की दीदी

अखबार से जुड़े बच्चे एक दोस्त की तरह जानकारियां व सुझाव सुधा दीदी से साझा करते हैं। डॉ.सुधा कहती है कि वह हजारों बच्चों की दीदी है और जब बच्चों के पत्र उन्हें मिलते हैं तो लगता है कि यह प्रयास सफल रहा है। पूर्व में बच्चों के अखबार से जुड़े तमाम बच्चे कई क्षेत्रों में कार्य भी कर रहे हैं।

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Posted By: Sunil Negi

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