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देहरादून, जेएनएन। सावन शुरू होते ही पूरे उत्तराखंड में लोकपर्व हरेला का उल्लास छा गया है। यह ऐसा पर्व है, जो देवभूमि में चैत्र मास की नवमी, सावन मास के पहले दिन (एक गते) और आश्विन मास की दशमी यानी वर्ष में तीन बार मनाया जाता है। किंतु, लोकजीवन में सबसे अधिक महत्व सावन के पहले दिन पड़ने वाले हरेला पर्व को ही मिला है, क्योंकि यह सावन की हरियाली से सराबोर होता है। हालांकि, वर्तमान में उत्तराखंड की सांझी संस्कृति का प्रतीक हरेला पर्व न सिर्फ एक अभियान का रूप ले चुका है, बल्कि सरकार ने इसे राज्य पर्व भी घोषित कर दिया है। इसके तहत पूरे सावन राज्य में पौधरोपण के साथ ही हरियाली के संरक्षण को विभिन्न रचनात्मक और सृजनात्मक गतिविधियां आयोजित की जाती हैं। इसका जिम्मा उठा रही है उत्तराखंडी लोक से जुड़ी प्रमुख सामाजिक साहित्यिक संस्था 'धाद'। संस्था के अध्यक्ष लोकेश नवानी कहते हैं कि इस वर्ष हरेला पर्व ढोल सागर के जणगुरु (प्रख्यात जानकार) ओंकार दास समेत ऐसे ही अन्य कलाकारों को समर्पित किया गया है। ये वो कलाकार हैं, जो हाशिये पर होने के बावजूद उत्तराखंड की लोक विरासत को बचाने और उसे सम्मान दिलाने के लिए पीढ़ियों से कार्य करते आ रहे हैं। 

समाज को प्रकृति से जोड़ता है पर्व 

हरेला में वैश्विक पर्व होने की भरपूर संभावनाएं है। कारण इसके मूल में सहज पारंपरिक बोध छिपा हुआ है, जो समाज को प्रकृति से जोड़ता है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो उत्तराखंड मूलरूप में एक पहाड़ी प्रदेश है और पहाड़ों पर ही भगवान शिव का वास माना जाता है। इसीलिए उत्तराखंडी लोकजीवन में हरेला पर्व का विशिष्ट स्थान है। 

अच्छी फसल के रूप में खुशहाली का सूचक 

सावन शुरू होने से नौ दिन पूर्व यानी आषाढ़ में हरेला बोने के लिए किसी थालीनुमा पात्र या टोकरी का चयन किया जाता है। इसमें मिट्टी डालकर गेहूं, जौ, धान, गहथ (कुलथ), भट, उड़द, सरसों आदि पांच या सात प्रकार के बीजों को बोया जाता है। नौ दिनों तक इस पात्र में रोज सुबह पानी छिड़कते हैं और दसवें दिन इसे काटा जाता है। चार से छह इंच लंबे इन पौधों को ही 'हरेला' कहा जाता है। घर के सदस्य इन्हें आदर भाव के साथ शीश पर रखते हैं। इसके मूल में यह भावना निहित है कि हरेला जितना बड़ा होगा, उतनी ही फसल भी बढिय़ा होगी। साथ ही कुमाऊंनी के इस लोकगीत को गाते हुए छोटों को आशीर्वाद दिया जाता है। गीत के बोल हैं, 'जी रये, जागि रये, धरती जस आगव, आकाश जस चाकव है जये, सूर्ज जस तराण, स्यावे जसि बुद्धि हो, दूब जस फलिये, सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये। (हमेशा सही-सलामत रहना, धरती का जैसा धैर्य तुम्हें मिले और आसमान का जैसा विस्तार।

सूर्य के जैसे तुम इस दुनिया में रोशनी फैलाना, जैसे सियार की चतुर बुद्धि होती है, उसी तरह तुम्हारी बुद्धि भी तेज हो। दूब घास जिस तरह से विपरीत परिस्थितियों में भी फूलती-फलती रहती है, उसी तरह तुम भी फूलते-फलते रहना। तुम्हारी इतनी लंबी आयु हो कि भात भी पीसकर खाना पड़े और शौच जाने के लिए लाठी का उपयोग करना पड़े)।

सांस्कृतिक विविधता का प्रदेश 

देवभूमि कहा जाने वाला उत्तराखंड जहां अपने तीर्थ स्थलों के कारण दुनियाभर में प्रसिद्ध है, वहीं यहां की संस्कृति में जितनी विविधता दिखाई देती है, शायद ही कहीं और देखने को मिले। उत्तराखंड को देश में सबसे ज्यादा लोक पर्वों वाला राज्य भी कहा जाता है। इन्हीं में से एक है 'हरेला '। 

हरेला पूजन के बाद एक-एक पौधा रोपने की परंपरा 

'हरेला' शब्द हरियाली से लिया गया है। पूर्व में उत्तराखंडी जनमानस का मुख्य कार्य कृषि होने के कारण हरेला का महत्व यहां के लिए विशेष रहा है। इसीलिए पीढिय़ों से उत्तराखंड में यह पर्व 'वृक्षारोपण त्योहार' के रूप में भी मनाया जा रहा है। सावन एक गते हरेला पर्व के दिन घरों में हरेला पूजने के बाद एक-एक पौधा अनिवार्य रूप से लगाए जाने की भी परंपरा है। लोक मान्यता है कि हरेला पर्व पर किसी भी पेड़ की टहनी को मिट्टी में रोपित कर दिया जाए तो पांच दिन बाद उसमें जड़े प्रस्फुटित हो जाती हैं और यह पेड़ हमेशा जीवित रहता है। 

अनाज और व्यंजन पर्व के रूप में होगा समापन 

हरेला पर्व के तहत 'धाद' संस्था की अगुआई में श्रावण पूर्णिमा तक विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इस कड़ी में 27 जुलाई को अस्थायी राजधानी में युवाओं की भागीदारी के साथ 'राइड फॉर हरेला' साइकिल रैली निकाली जाएगी। जबकि, चार अगस्त को 'वॉक फॉर हरेला' और दस अगस्त को व्यापक स्तर पर पौधरोपण कार्यक्रम होगा। पर्व का समापन 14 अगस्त को मुख्यमंत्री आवास पर होगा। इस दिन को उत्तराखंड के अनाज और व्यंजन पर्व के रूप में मनाया जाएगा। 

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Posted By: Raksha Panthari

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