विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 17, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Ghee Sankranti: पारंपरिक उत्सव घी संक्रांति आज, इस दिन घी खाने का क्या है विशेष महत्व

By Sunil NegiEdited By:
Published: Wed, 17 Aug 2022 09:09 AM (IST)

Ghee sankranti in uttarakhand उत्तराखंड अपनी संस्कृति के लिए जाना जाता है। ऐसा ही पारंपरिक उत्सव घी संक्रांति है। इसे ...और पढ़ें

Ghee sankranti in uttarakhand : पारंपरिक उत्सव घी संक्रांति के दिन घी खाने का विशेष महत्‍व है।
Ghee sankranti in uttarakhand : पारंपरिक उत्सव घी संक्रांति के दिन घी खाने का विशेष महत्‍व है।

जागरण संवाददाता, देहरादून। Ghee sankranti in uttarakhand उत्तराखंड अपनी संस्कृति के लिए जाना जाता है। ऐसा ही पारंपरिक उत्सव घी संक्रांति (Ghee Sankranti) भी है। इसे घ्यू संक्रांत और ओलगिया भी कहते हैं। आज के दिन घी खाने का विशेष महत्‍व है। वहीं, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रदेशवासियों को घी संक्रांति की शुभकामना दी है।

पर्व से जुड़ी लोक मान्यता

  • कुमाऊं के इलाके में इस दिन मक्खन अथवा घी के साथ बेडू रोटी (उड़द की दाल की पिट्ठी भरी रोटी) खाने का रिवाज है।
  • मान्यता है कि इस दिन घी (Ghee sankranti in uttarakhand) न खाने वाले व्यक्ति को दूसरे जन्म में गनेल (घोंघे) की योनि प्राप्त होती है।
  • कुमाऊं का कृषक वर्ग इस पर्व पर गाबे (अरबी के पत्ते) भुट्टे, दही, घी, मक्खन आदि की ओलग सबसे पहले ग्राम देवता को चढ़ाता है।
  • इसके बाद इन्हें अपने उपयोग में लाता है। पंडित, पुरोहितों व रिश्तेदारों को भी ओलग दी जाती है।

ओलग की प्रथा

कुमाऊं में चंद शासकों के काल में भी किसान शासनाधिकारियों को विशेष भेंट ओलग देते थे। गांव के कास्तकार अपने खेतों में उगे फल, शाक-सब्जी राज दरबार में भेंट करते थे। यह ओलग की प्रथा कहलाती थी।

घी संक्रांति पर मुख्यमंत्री ने दी शुभकामना

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रदेशवासियों को घी संक्रांति (Ghee Sankranti) की शुभकामना दी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारे पारंपरिक लोकपर्व सांस्कृतिक विरासत का मजबूत आधार होते हैं। घी संक्रांति राज्य का प्रमुख लोकपर्व होने के साथ ही अच्छी फसलों तथा अच्छे स्वास्थ्य की कामना से जुड़ा पर्व भी है।

हमारे पर्व हमें अपनी संस्कृति एवं प्रकृति से जुड़ने की प्रेरणा देते हैं। इन पर्वों की परंपरा से भावी पीढ़ी को जागरूक करना जिम्मेदारी है।