केदार दत्त, देहरादून

उत्तराखंड में 3.95 लाख हेक्टेयर में पसरे चीड़ के जंगलों से हर साल निकलने वाले 23 लाख टन पिरुल (चीड़ की पत्तियां) ने वन महकमे के माथे पर बल ला दिए हैं। अग्निकाल के दौरान यही पिरुल जंगलों में आग के फैलाव का बड़ा कारण बनता है। हालांकि, इस चुनौती से निबटने के लिए पिरुल से बिजली, जैविक खाद, चेकडैम समेत कई उपयोग ढूंढे गए हैं, लेकिन ये अभी प्रयोग के स्तर तक ही सिमटे हैं। यही नहीं, पिछली सरकार के कार्यकाल में चीड़ को हटाने पर भी जोर दिया गया, लेकिन एक हजार मीटर से पेड़ कटान पर प्रतिबंध के चलते यह कोशिशें परवान नहीं चढ़ पाई।

अग्निकाल में जंगलों में आग की घटनाओं में करीब 65 फीसद में इसके फैलाव की वजह पिरुल बनता है। प्रदेश में 15.25 फीसद यानी 394383.84 हेक्टेयर में चीड़ के वन हैं। इनसे हर साल प्रति हेक्टेयर छह टन पिरुल गिरता है। इस हिसाब से यह प्रतिवर्ष बैठता है 23.66 लाख टन। असल में पिरूल में अम्लीय गुण होने और गर्मियों में इसके सूखने से यह आग में घी का काम करता है। यही नहीं, चीड़ के जंगलों में पिरुल के कारण दूसरी वनस्पतियां भी पनप नहीं पाती।

हालांकि, पिरुल से निबटने को कई तरीके ढूंढे जा रहे हैं, लेकिन व्यापक स्तर पर पहल अब तक नहीं हो पाई है। पिरुल से बिजली, टिकली कोयला, जैविक खाद, चेकडैम जैसे समाधान निकाले गए हैं, मगर ये अभी प्रायोगिक तौर पर ही हैं। ये बात अलग है कि पिथौरागढ़ जिले में अवनी व सिमल्या गांव में पिरुल से बिजली बनाने का एक गैर सरकारी संस्था का प्रयोग सफल रहा है, मगर इसे व्यापक रूप में फैलाने की दिशा में ठोस पहल की दरकार है।

अब जबकि अग्निकाल शुरू होने को है तो पिरूल की चुनौती फिर से मुंहबाए खड़ी है। उत्तराखंड के प्रमुख मुख्य वन संरक्षक जयराज भी इससे इत्तेफाक रखते हैं। वह बताते हैं कि इस दृष्टिकोण से चीड़ के जंगलों में वर्षा जल संरक्षण पर खास फोकस की तैयारी है। इस क्रम में वहां खाल-चाल, छोटे-बड़े तालाब जैसे उपाय किए जा रहे, ताकि बारिश होने पर इनमें पानी जमा रहे। इससे जहां आग पर काबू पाने में मदद मिलेगी, वहीं जलस्रोत भी रीचार्ज होंगे।

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पिरुल पर रॉयल्टी खत्म

राज्य में पिरुल की समस्या से निबटने के लिए सरकार ने इसके उठान पर ली जाने वाली रॉयल्टी खत्म कर दी है। प्रमुख मुख्य वन संरक्षक जयराज के मुताबिक पिरुल के लिए ट्रंाजिट पास की जरूरत भी नहीं है।

By Jagran