देहरादून, सुमन सेमवाल। जिस भी व्यक्ति के साथ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के आश्रित होने का तमगा लगा होता है, वह उसके लिए किसी सौभाग्य से कम नहीं है। यही कारण है कि आजादी के संग्राम से जुड़ी हर एक बात किसी धरोहर से कम नहीं होती। शायद इसीलिए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के एक आश्रित ने ब्रिटिशकाल में लगाए गए 50 रुपये जुर्माने को वापस प्राप्त करने की इच्छा जाहिर कर दी। इसके लिए सेनानी के आश्रित ने बकायदा जिलाधिकारी पौड़ी के कार्यालय में आरटीआइ भी दायर की।

पौड़ी के जियादमराड़ा निवासी जयप्रकाश रतूड़ी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पूर्णानंद के आश्रित हैं। पूर्णानंद पर वर्ष 1930 में छह माह की जेल (जेल यात्रा) के साथ 50 रुपये का जुर्माना लगाया था। इस राशि की वापसी की इच्छा जाहिर करते हुए जयप्रकाश ने आरटीआइ में पूछा की जुर्माने की रकम कैसे वापस मिल सकती है और अब इसके लिए कितना भुगतान करना पड़ेगा। इस अनोखी आरटीआइ से हैरत में पड़े अधिकारियों ने जवाब दिया कि सूचना शून्य है। इससे नाराज जयप्रकाश ने सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया।

प्रकरण की सुनवाई करते हुए राज्य सूचना आयुक्त ने संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया और स्पष्ट सूचना देने को कहा। जवाब में जिलाधिकारी कार्यालय के लोक सूचनाधिकारी/मुख्य प्रशासनिक अधिकारी ने कहा कि उनके रिकॉर्ड में सिर्फ इस बात का जिक्र है कि पूर्णानंद को यमकेश्वर पट्टी वल्ला उदयपुर में कांग्रेस की बैठक में भाग लेने और जनता को उकसाने के आरोप में छह माह की कड़ी सजा सुनाई गई थी। इसके साथ ही उन पर 50 रुपये के अर्थदंड भी लगाया गया था। हालांकि, यह अर्थ दंड जमा किया गया या नहीं, इसका कोई प्रमाण कार्यालय में नहीं मिल पाया। लिहाजा, इस राशि की वापसी का भी सवाल नहीं उठता। सूचना आयोग ने भी इस जवाब को उचित और दी गई सूचनाओं को पर्याप्त मानते हुए अपील का निस्तारण कर दिया।

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1972 में तत्कालीन जिलाधिकारी ने दी सत्यापित प्रति

पूर्णानंद को जेल यात्रा भेजे जाने व जुर्माने पर 31 जुलाई 1972 को तत्कालीन जिलाधिकारी हेमंत कुमार ने पत्र जारी किया था। इस पत्र के आधार पर ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के आश्रित जयप्रकाश ने आरटीआइ में जानकारी मांगकर जुर्माने की रकम को वापस प्राप्त करने की इच्छा जाहिर की।

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Posted By: Sunil Negi

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