देहरादून, [जेएनएन]: सेब उत्पादकों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी होती जा रही है। एक तो बर्फबारी-बारिश कम हुई और जो हुई वह भी समय पर नहीं। फिर, फ्लॉवरिंग के समय पर ओलावृष्टि हो गई। वहीं, सिस्टम की सुस्ती और लापरवाही किसी से छिपी नहीं है। बागवान सरकार से हिमाचल की तर्ज पर नीति बनाने की मांग लंबे समय से करते आ रहे हैं, जिससे मौसम की बेरुखी से होने वाले नुकसान की भरपाई हो, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है। एक तरफ मौसम की मार और दूसरी तरफ सिस्टम की बेरुखी ने किसानों को पस्त कर दिया है।

स्वाद में उत्तराखंडी सेब हिमाचल और कश्मीर से कम नहीं है, खासकर हर्षिल का सेब। लेकिन, सिस्टम की सुस्ती और लापरवाही से आज तक उत्तराखंडी सेब की अपनी पहचान नहीं बन पाई है। नतीजतन, सेब का उत्पादन और क्षेत्रफल आधे से भी कम हो गया है। हकीकत ये है कि उत्तराखंड का सेब हिमाचल एप्पल के नाम से बाजार में बिकता है। राज्य गठन के वक्त प्रदेश में सेब का उत्पादन करीब दो लाख मीट्रिक टन था, जो अब घटकर 62 हजार मीट्रिक टन पर सिमट गया है। 

तीन साल पहले सरकार ने फैसला लिया था कि उत्पादकों को उत्तराखंड का लोगो लगी पेटियां दी जाएंगी। लेकिन, कभी पेटियां मिली ही नहीं और मिली तो उनकी गुणवत्ता अच्छी नहीं थी। देहरादून में त्यूणी तहसील क्षेत्र में सबसे ज्यादा सेब उत्पादन होता है। बागवान पीतांबर दत्त बिजल्वाण, संतराम चौहान, जगतराम नौटियाल का कहना है कि 15 दिसंबर से 15 जनवरी के बीच अगर जरूरी चिलिंग प्वाइंट मिल जाए तो उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है। 

लेकिन, इस बार फरवरी आखिर और मार्च में ही बर्फबारी हुई। रही-सही कसर पूरी कर दी ओलावृष्टि ने। सेब का उत्पादन 50 फीसद तक प्रभावित हो सकता है। मेघाटू के जेआर शर्मा और विरेंद्र शर्मा का कहना है कि जब तक हिमाचल की तर्ज पर बागवानी नीति नहीं बनेगी, तब तक समस्याएं बरकरार रहेंगी। सेब उत्पादन में हिमाचल का नाम विश्व फलक पर है। सरकारें उद्यान को लेकर बात तो बहुत करती रही हैं, लेकिन किया किसी ने कुछ नहीं।

उत्तरकाशी के बागवान धराली गांव निवासी संजय पंवार, हर्षिल के बसंती नेगी, मुखवा के सतेंद्र सेमवाल का कहना है कि जून-जुलाई में सेब की तुड़ाई शुरू होती है, उस वक्त बरसात रहती है। इससे तमाम रास्ते कई-कई दिनों तक अवरुद्ध रहते हैं और 20 से 30 फीसद माल तो रास्तों में ही खराब हो जाता है। सरकार ने मार्केटिंग की कोई व्यवस्था अभी तक नहीं की है।

जिलों से पूछी पेटियों की डिमांड

उद्यान विभाग के निदेशक आरसी श्रीवास्तव ने बताया कि सभी जिलों से पेटियों की डिमांड पूछी गई है। इसके बाद टेंडर निकाले जाएंगे। समय पर उत्पादकों को पेटियां उपलब्ध करा दी जाएंगी। उद्यान विभाग समय-समय पर सेब की ग्रेडिंग-पैंकिंग के बारे में भी उत्पादकों को तकनीकी जानकारी देता है, जिससे बाजार में अच्छा दाम मिले। साथ ही ओले से सेब को नुकसान न हो, इसके लिए पेड़ों के ऊपर जालियां लगाई जा रही हैं। अभी तक साढ़े तीन लाख वर्ग मीटर में इस कार्य को किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि चिलिंग प्वाइंट की जरूरत करीब-करीब पूरी हो गई है। ओलावृष्टि से नुकसान के बारे में जिलों से आंकड़े आने के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा।  

 जिला--------------क्षेत्रफल---------उत्पादन 

नैनीताल----------1243-------------9070

अल्मोड़ा-----------1572-----------14076

बागेश्वर-------------97---------------9.14

पिथौरागढ़--------1610-------------3020

चंपावत-------------323---------------328

देहरादून-------------4894-----------7489

पौड़ी-----------------1125------------3065

टिहरी---------------3822-------------1915

चमोली---------------1162------------3357

रुद्रप्रयाग-------------411-------------202

उत्तरकशी-------------8940-------19530

(क्षेत्रफल हेक्टेयर और उत्पादन मीट्रिक टन में)

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Posted By: Sunil Negi