देहरादून, [अंकुर अग्रवाल]: प्रशासनिक मशीनरी की विफलता ही कहेंगे कि दून में अतिक्रमणकारियों और अवैध कब्जेदारों के हौसले बुलंद हैं। शहर हो या देहात। सड़क, नाली या जमीन। हर जगह बेधड़क जमीनें कब्जाई जा रहीं और कब्जेदारों की हनक ऐसी कि सरकारी टीमों को बैरंग लौटा दे। बीते वर्ष यूजेवीएनएल की चार बीघा जमीन पर अवैध कब्जे करने का मामला सामने आया तो फिर इंदिरानगर में नगर निगम की जमीन पर। दोनों मामलों में सबसे बड़ी नाकामी जिला प्रशासन और पुलिस समेत यूजेवीएनएल एवं नगर निगम की रही। पहले तो कब्जेदारों को रोका नहीं गया और जब नींद टूटी तो विरोध मुंह ताने सामने खड़ा रहा। यही वजह शेष जगह हो रहे अतिक्रमण पर भी हावी रहती है।

अप्रैल में बगरियाल गांव में अतिक्रमण को हटाने गए एसडीएम पर हुए हमले ने साफ कर दिया कि दून में अतिक्रमणकारी बेखौफ एवं बेलगाम हैं। स्थिति ये है कि पिछले सत्रह वर्षों में नगर निगम की करीब 7800 हेक्टेयर भूमि में से अब सिर्फ 240 हेक्टेयर बची है। शेष जमीन पर भूमाफिया का कब्जा है। हालात ये हैं कि अफसरों की कमजोर इच्छाशक्ति, राजनीतिक दखलंदाजी और अन्य कारणों के चलते करोड़ों की संपत्ति पर अवैध कब्जा हो चुका है। कहीं माफिया दबंगई से कब्जे कर लिए तो कहीं नेताओं ने वोट बैंक की खातिर जिसे चाहे उसे जमीनों पर बसा डाला। छोटे-मोटे भूमाफिया के साथ ही अब बिल्डरों ने भी निगम की संपत्तियों पर कब्जा शुरू कर दिया है। अपने प्रोजेक्ट के आसपास निगम की जमीनों पर बिल्डर भी कब्जा करने में देर नहीं लगा रहे। शहर में कई जगह ऐसी हैं, जहां प्राइम लोकेशन पर निगम की जमीनें हैं। इनकी कीमत भी उसी तर्ज पर है, लेकिन खुलेआम चल रहे कब्जे के 'खेल' के बावजूद निगम ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। हां, महज खानापूर्ति के लिए कभी-कभार अतिक्रमण हटाने का ड्रामा जरूर किया, मगर जमीनें खाली नहीं हुई। अफसरों का अगर यही रवैया रहा तो इस शेष जमीन पर भी कब किसकी नजर पड़ जाए, कहा नहीं जा सकता।

फुटपॉथ पर नहीं मिलती जगह

सरकारी मशीनरी दावा करती रहती है कि, राजधानी में फुटपॉथ हैं। मगर सच एकदम उलट है। फुटपॉथ तो दूर की बात, यहां तो लोगों को पैदल चलने की जगह भी नहीं दिखती। कहीं सड़क पर दुकान सजी हैं तो कहीं वर्कशॉप चल रहे हैं। ऊपर से वाहनों की रेलमपेल अलग। शहर का कोई हिस्सा ऐसा नहीं है, जहां अतिक्रमण पसरा हुआ न हो। वाहनों का सड़कों से गुजरना मुश्किल हो चुका है व पैदल चलने वाले जगह तलाशते हैं कि कहां चलें। शहर के मुख्य बाजार पलटन बाजार और धामावाला समेत मोती बाजार, डिस्पेंसरी रोड, राजपुर रोड, चकराता रोड, आढ़त बाजार, कांवली रोड, गांधी रोड, प्रिंस चौक व झंडा बाजार आदि के हालात देखकर अंदाजा हो सकता है कि अतिक्रमण अनदेखा करने में हमारी सरकारी मशीनरी कितनी आगे है।

मंत्री जी के दावे भी हुए हवा

शहर को अतिक्रमणमुक्त करने व मॉडल बनाने के शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक के दावे भी हवा हो गए हैं। स्थिति ऐसी है कि कौशिक के ड्रीम प्रोजेक्ट आइएसबीटी से घंटाघर मॉडल रोड पर दोबारा से अवैध कब्जे हो चुके हैं। जिला प्रशासन पूरी तरह तमाशबीन बना हुआ है। सरकार ने इच्छाशक्ति जताई थी तो गत वर्ष जून में एक अभियान चलाया गया, मगर उसके बाद प्रशासन ने कार्रवाई के नाम पर एक अवैध ईंट 

तक नहीं हटाई।

यहां भी कब्जाई गई हैं जमीनें

-ब्रह्मावाला खाला में करीब 70 बीघा

-ढाकपट्टी राजपुर में करीब 15 बीघा

-मयूर विहार में करीब पांच बीघा

-सोनिया बस्ती में करीब पांच बीघा

-लोहारवाला किशननगर में पांच बीघा

-निरंजनपुर पटेलनगर में पांच बीघा

-कारगी में 100 बीघा जमीन

-शहरभर में जगह-जगह अन्य जमीनों व नदी-नालों पर भी कब्जे

यह है शहर का सूरतेहाल

-सड़कों के दोनों ओर नालियों तक फैला है अतिक्रमण

-फुटपॉथ पर व्यापारियों, फड़-ठेली वालों का कब्जा

-व्यापारियों ने फुटपॉथ के साथ-साथ सड़कों तक सजाया है सामान

-वर्कशॉप, फर्नीचर बनाने का काम भी सड़क पर

-सड़कों के दोनों ओर लगी रहती हैं फल-सब्जी, खाने-पीने की ठेलियां

-कहीं आग लग जाए तो दमकल की गाड़ी का पहुंचना मुश्किल

-अतिक्रमण के चलते बाजारों में भीड़ होने से बड़ रही छेड़खानी

-पर्स चोरी, चेन लूट आदि वारदात में भी हो रहा इजाफा

-अतिक्रमण के चलते हादसों का ग्राफ भी बढ़ रहा लगातार

जिलाधिकारी एसए मुरूगेशन का कहना है कि अतिक्रमण के विरुद्ध लगातार कार्रवाई की जाती है। शीघ्र ही संयुक्त टीम बनाकर  अतिक्रमण के खिलाफ व्यापक अभियान चलाकर कार्रवाई होगी। अतिक्रमणकारियों के विरुद्ध मुकदमे दर्ज किए जाएंगे।

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By Sunil Negi