संवाद सूत्र, साहिया: सामाजिक ताने-बाने और बनी व्यवस्था में हर वर्ग के लिए कार्य निर्धारित थे। अपने काम-काज से जुड़कर प्रत्येक परिवार अपनी आर्थिकी का सुधार करता था, जिससे उनका खर्च चलता था। तकनीकी संसाधन बढ़े तो व्यवस्था बदलती गई। हालत यह है कि लोग अपने पुश्तैनी पेशे से हटकर नए रोजगार आदि की तलाश में भटकने लगे, हालत बेरोजगारी बढ़ती गई और परिवार का खर्च चलाना भी अब मुश्किल होने लगा। ऐसे तमाम व्यक्तियों को आइना दिखा रहे हैं धोईरा खदर के किसान परमदास, जो अपने पुश्तैनी पेशे बांस की कंडी बनाकर अपने परिवार का पूरा खर्च चलाते हैं।

धोईरा खादर निवासी परमदास ने अतिरिक्त कमाई के लिए अपने बांस की कंडी, टोकरी बनाने के पुश्तैनी हुनर को अभी भी बरकरार रखा है। सिचाई विभाग के खंडहर बने भवन में रहकर परमदास कंडी और टोकरा बेचकर अच्छी कमाई कर रहे हैं। उनका कहना है कि परिवार बड़ा है, इसलिए भरण-पोषण के लिए अतिरिक्त काम करना जरूरी है। यदि किसी में काम करने का जज्बा और हूनर हो तो आर्थिक तंगी दूर की जा सकती है। कालसी ब्लाक के धोईरा खादर में परम दास खेतीबाड़ी के साथ ही बांस की कंडी और टोकरे बनाने का हुनर भी जानते हैं। बचपन में परिवार के सदस्यों से सीखे इस पुश्तैनी हुनर से वह कोरोना काल में भी अपनी आर्थिकी जुटाने में सफल रहे। परमदास का दस सदस्यों का परिवार है। चार लड़कियों की वह शादी कर चुके है, जबकि चार लड़कों समेत छह सदस्य अभी परिवार में हैं। दो बेटे मजदूरी करते हैं और दो अभी छोटे हैं। उनका कहना है कि खेतीबाड़ी के बाद जो भी अतिरिक्त समय मिलता है, वह बांस की कंडी व टोकरा बनाने में लगा देते हैं। वर्तमान में एक बांस की कंडी की कीमत चार सौ रुपये है और टोकरा दो सौ रुपये में आसानी से बिक जाता है। इस कार्य से उनकी पूरे साल भर की कमाई हो जाती है और यही कमाई खेतीबाड़ी के भी काम आती है, जिससे होने वाली आय से परिवार का पालन-पोषण सही से हो जाता है।

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