देहरादून, जेएनएन। कश्मीर में आतंकियों और अलगाववादियों द्वारा सेना और सुरक्षाबलों में भर्ती होने वालों को इस्लाम का दुश्मन करार देने, उनके सामाजिक बहिष्कार के फरमान के बाद भी स्थानीय युवाओं में भारतीय सेना का हिस्सा बनने का जोश कम नहीं हो रहा है। भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय वह कुछ अलग कर दिखाने का जज्बा रखते हैं। आतंक की दुनिया से निकल शांति और सम्मान की जिंदगी जीना चाहते हैं। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है जम्मू कश्मीर के अनंतनाग जिले के नदीम अहमद वानी ने। 

उन्होंने धारा के विपरीत अपना अलग मुकाम बनाया है। उनके पिता अब्दुल हमीद तांबे के कारोबार से जुड़े हैं। नदीम ने बताया कि उनका एक भाई मोहम्मद आसिफ पुलिस में है। वह कहते हैं, शुक्रगुजार हूं कि तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी उनके परिवार ने उन्हें इस काबिल बनाया। वह भी तब जब घाटी में पग-पग पर चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। कभी-कभी लगता है कि आप ककूननुमा कैद में हैं।

घाटी के युवाओं को उनका संदेश है कि आतंक नहीं समाज की मुख्यधारा से जुड़ें। मन में कट्टरवाद का जहर नहीं देशभक्ति की मशाल जलाएं, क्योंकि आतंक और अलगाववाद से कुछ भी हासिल नहीं होगा। अनुच्छेद-370 हटाए जाने के बाद की स्थिति पर उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार किया।

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बोले कि यह राजनीतिक मसला है। फिर काफी समय से घर भी नहीं गया हूं। वर्ष 2010 में वह आर्मी मेडिकल कॉप्स का हिस्सा बने थे। अपनी मेहनत और कड़े परिश्रम के बूते अब वह सैन्य अफसर बनने की राह पर हैं। एसीसी में उन्होंने कला वर्ग में कमांडेंट सिल्वर मेडल भी हासिल किया है। 

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Posted By: Raksha Panthari

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