राज्य ब्यूरो, देहरादून: क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट को लागू कराने में निजी चिकित्सकों के विरोध को देखते हुए अब सरकार बीच का रास्ता निकालने की तैयारी कर रही है। इस उद्देश्य से क्या प्रावधान अपनाए जाएं, इसके लिए शासन, विभाग और चिकित्सकों की एक समिति का गठन किया गया है। इस समिति ने एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपनी है। वहीं, शासन, उत्तराखंड नर्सिग होम एक्ट में भी इसकी संभावनाएं तलाश रहा है। क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट को केंद्र सरकार ने 2010 में पारित कर दिया था। साथ ही सभी राज्यों को इसे कड़ाई से लागू कराने की बात कही थी। उत्तराखंड में यह एक्ट साल 2013 में विधानसभा में पारित किया गया, लेकिन इसे अभी लागू नहीं किया जा सका है। आइएमए इस मामले में हरियाणा की तर्ज पर 50 बेड के अस्पतालों को एक्ट के तहत पंजीकरण में छूट देने की माग कर रही है। इसके अलावा न्यूनतम मानक का खाका भी तैयार किया गया है। सरकार व शासन के साथ उसकी कई दौर की वार्ता हो चुकी है, पर समाधान अब तक नहीं निकल पाया है। अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकार व शासन ने फिर एक बार इसे लेकर कसरत शुरू की है। सोमवार को आइएमए पदाधिकारियों की मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से सचिवालय में मुलाकात हुई थी। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए थे कि एक्ट में संशोधन के लिए अधिकारियों व चिकित्सकों की एक कमेटी गठित की जाए। अपर सचिव स्वास्थ्य युगल किशोर पंत का कहना है कि कमेटी को अब इस संबंध में अपनी रिपोर्ट तैयार करनी है। इसमें विशेष ध्यान रखा जाएगा कि किसी का अहित न हो। वहीं, आइएमए के प्रांतीय महासचिव डॉ. डीडी चौधरी ने बताया कि प्रारूप तैयार किया जा रहा है। आगामी 16 सितंबर को प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक आयोजित की जाएगी। इसमें कमेटी द्वारा तैयार प्रारूप रखा जाएगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि नए प्रारूप को विधानसभा से पारित कराया जा सकता है।