जागरण संवाददाता, देहरादून : प्रमुख वन संरक्षक जयराज ने कहा कि फारेस्ट फायर कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। यदि लोगों को जंगलों से जोड़ा जाए तो इससे आसानी से निपटा जा रहा है। लोगों को जंगलों से जोड़ना ही वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती है।

गुरुवार को शुक्लापुर स्थित हेस्को ग्राम में हैस्को और भाभा रिसर्च सेंट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कंट्रोल फारेस्ट फायर-एन इनक्लूसिव एंड इंटीग्रेटेड स्टेप विषय पर आयोजित कार्यशाला में उन्होंने यह बात कही। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में अधिकतर वनाग्नि की घटनाएं मानवजनित होती है। यदि वन विभाग और ग्रामीण आपसी भागीदारी से काम करें तो यह मुद्दा कोई बड़ा नहीं है। उन्होंने कहा कि सूखी पत्ती का प्रयोग कंपोस्ट खाद के रूप में किया जाए। ऐसे उद्यमियों को वन विभाग प्रोत्साहन देगा। हेस्को के संस्थापक डॉ. अनिल जोशी ने कहा कि पानी, हवा, मिट्टी व जंगल वन विभाग व सरकार का ही दायित्व नहीं हैं। बल्कि यह सामूहिक जिम्मेदारी है। वनाग्नि की रोकथाम के लिए ग्रामीणों की भागीदारी जरूरी है। इसके साथ ही ही उन्होंने चीर पाइन के लिटर का बेहतर उपयोग की जानकारी दी।

अल्मोड़ा से आए ईश्वर जोशी ने कहा कि सेंचुरी क्षेत्र में ग्रामीण बिना स्वीकृति के गिरे सूखे पेड़ों को उठा भी नहीं सकते। उसके लिए सुविधा शुल्क देना पड़ता है। इसके लिए स्थानीय लोगों को जोड़कर नीति बननी चाहिए। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों को जंगलों से जोड़ने की बात तो हो रही है पर आग बुझाने के लिए पीआरडी के जवानों को लाया जा रहा है। कड़े वन नीतिया के कारण लोग जंगलों से दूर होते जा रहे हैं। और पशुपालन में भी कमी आ रही है। बार्क के पूर्व एसोसिएट निदेशक डॉ. बीएस तोमर ने कहा कि अगर आइआरएस और एफएसआइ सैटेलाइट के माध्यम से लोगों को आग लगने से पहले बताएं और ग्रामीणों को तुरंत आग बुझाने के लिए मेहनताना दिया जाए तो अच्छे परिणाम आएंगे। इसके अतिरिक्त कार्यशाला में एफआरआइ के वैज्ञानिक डॉ.ओमवीर सिंह, निदेशक यूसर्क डॉ. दुर्गेश पंत, डाल्फिन पीजी इंस्टीट्यूट के हेड फोरेस्ट्री प्रो. सैस विश्वास, ग्राफिक एरा हिल से डॉ. कमलकात जोशी सहित बड़ी संख्या में लागे उपस्थित थे।

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