जागरण संवाददाता, देहरादून। देश और उत्तराखंड के गौरव जनरल बिपिन रावत को मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित करने का एलान किया गया है। जिससे उत्तराखंड एक बार फिर गौरान्वित हुआ है। जनरल रावत मूल रूप से जनपद पौड़ी-गढ़वाल के कल्जीखाल ब्लाक के सैणा गांव के रहने वाले थे। अपनी पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए वह इस पद पर पहुंचे। इससे पहले उनके पिता ले जनरल लक्ष्मण सिंह रावत भी सेना में डिप्टी चीफ के पद से रिटायर हुए थे। जनरल बिपिन रावत के नाना ठाकुर किशन सिंह परमार उत्तरकाशी क्षेत्र से विधायक रहे हैं।

जनरल बिपिन रावत की प्रारंभिक शिक्षा दून स्थित कैंब्रियन हॉल स्कूल से हुई। दिसंबर 1978 में वह भारतीय सैन्य अकादमी (आइएमए) से पास आउट हुए। उन्हें श्रेष्ठ में सर्वश्रेष्ठ स्वार्ड आफ आनर भी प्रदान किया गया था। प्रथम चीफ आफ डिफेंस स्टाफ के रूप में उनकी नियुक्ति से उत्तराखंड गौरान्वित हुआ था। सीडीएस का पद दिए जाने से पहले वह 27वें थल सेनाध्यक्ष थे। उन्होंने तीनों सेनाओं की क्षमताएं बढ़ाने में अहम योगदान दिया।

आठ दिसंबर को तमिलनाडु में हुए हेलीकाप्टर हादसे में उनकी मौत हो गई थी। उनकी दून में बसने और एक स्कूल खोलने की इच्छा थी, पर अफसोस उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका। राज्य के सीमांत क्षेत्रों से पलायन रोकने के लिए उन्होंने कई सुझाव दिए थे। उनकी ही पहल पर ईको टास्क फोर्स ने सीमांत क्षेत्रों में अखरोट के पेड़ लगाने का काम शुरू किया। उनके चाचा भरत सिंह रावत का कहना है कि यह सम्मान न सिर्फ उनके, बल्कि पूरे राज्य के लिए गौरव की बात है। उन्होंने कहा कि जनरल रावत अपने जीवनकाल में देश की सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए।

ग्राम सभा बिरमोली की प्रधान मानसी देवी, बिरमोली निवासी विकास सहित अन्य ग्रामीणों ने भी जनरल रावत को पद्म विभूषण मिलने पर हर्ष जताया है। कहा कि जिस तरह उन्होंने देश सेवा में अपना अमूल्य योगदान दिया, उससे पूरा क्षेत्र स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है।

Edited By: Sunil Negi