देहरादून, केदार दत्त। देश में सर्वाधिक बाघ घनत्व वाले कार्बेट टाइगर रिजर्व के जंगलों में बेहतर वासस्थल और भरपूर भोजन की उपलब्धता के बावजूद बाघ के बढ़ते हमलों ने नींद उड़ा दी है। सालभर के वक्फे में बाघ अब तक चार वनकर्मियों की जान ले चुके हैं, जबकि इससे पहले 18 साल में ऐसी छह घटनाएं हुई थीं। ऐसे में कई प्रश्न भी खड़े हो रहे हैं। 

सवाल उठ रहा कि अब अचानक जंगल में बाघ के व्यवहार में ऐसा बदलाव क्यों नजर आ रहा। कहीं जंगल अथवा सिस्टम की कार्यशैली में कोई खोट तो नहीं। इस उलझन से पार पाने को भारतीय वन्यजीव संस्थान को गहन अध्ययन की जिम्मेदारी सौंपने की तैयारी है।

ढाई सौ से अधिक बाघों की संख्या वाला कार्बेट टाइगर रिजर्व इन दिनों वनकर्मियों पर बाघ के हमलों के कारण चर्चा में है। गतवर्ष नवंबर में रिजर्व की ढिकाला रेंज में बाघ ने एक वनकर्मी पर हमला किया। इसके बाद जुलाई में खनसूर, अगस्त में ढिकाला और अब चौखम क्षेत्र में बाघ ने गश्त के दौरान एक-एक वनकर्मी की जान ली है। ढिकाला रेंज और खनसूर-चौखम की सीमाएं आपस में मिलती हैं। 

इन घटनाओं ने महकमे की पेशानी पर बल डाल दिए हैं। महकमा पशोपेस में है कि जंगल में भोजन की पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद बाघ के हमले क्यों बढ़ रहे हैं। अभी तक ये भी स्पष्ट नहीं हो पाया कि हमले करने वाला एक ही बाघ है या अलग-अलग। जानकारों की मानें तो यदि एक ही बाघ है तो वह अशक्तता की स्थिति में हमले कर सकता है। यदि अलग-अलग हैं तो यह चौंकाने वाली बात है।

ऐसे में प्रश्न ये भी उठता है कि कहीं जंगल में खाद्य श्रृंखला में कोई गड़बड़ी तो नहीं आ रही, जिससे बाघ के स्वभाव में परिवर्तन दिख रहा है। यह सवाल भी फिजां में तैर रहा है कि गश्त की रणनीति में कहीं कोई खोट तो नहीं है। गश्त के दौरान वनकर्मियों को मोबाइल एप पर लोकेशन देनी होती है। टाइगर रिजर्व के कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां कनेक्टिविटी नहीं है। ये बात भी उठ रही कि एप में लोकेशन व रिकार्ड दर्ज करने के दरम्यान तो ऐसी घटनाएं नहीं हो रहीं। ऐसे तमाम सवाल हर किसी को कचोट रहे हैं।

मनोबल पर भी असर

बाघ के हमलों में वनकर्मियों की जान जाने के बावजूद इसके समाधान को अभी तक कदम नहीं उठाए गए हैं। इससे वनकर्मियों के मनोबल पर भी असर पड़ रहा है।

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कराया जाएगा गहन अध्ययन 

उत्तराखंड के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक राजीव भरतरी के मुताबिक, कार्बेट में वनकर्मियों पर बाघ के हमले की घटनाएं असामान्य और चिंताजनक हैं। खासकर सालभर के भीतर दो स्थानों पर चार हमले। इन सब परिस्थितियों को देखते हुए भारतीय वन्यजीव संस्थान से गहन अध्ययन कराने की तैयारी है। इसके बाद ही वस्तुस्थिति सामने आ पाएगी।

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Posted By: Bhanu

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