देहरादून, राज्य ब्यूरो। प्रदेश में वर्ष 2018 तक राज्य के 35 ब्लड बैंकों में से 13 ऐसे थे जो पांच माह से लेकर 20 साल तक के एक्सपायर्ड लाइसेंस के साथ संचालित हो रहे थे। इन्होंने भारत के नियंत्रक और लेखा महानिरीक्षक (कैग) द्वारा पूर्व में इंगित खामियों को दूर नहीं किया। यहां तक कि इनमें असुरक्षित तरीके से रक्त लिया और जमा कराया जा रहा था। कैग ने इस प्रकरण में स्टेट ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल (एसबीटीसी) की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए हैं। 

रिपोर्ट में कहा गया कि एसबीटीसी ने भी आवश्यक 96 निरीक्षण के सापेक्ष केवल 22 निरीक्षण किए थे। इनमें भी कैग द्वारा चयनित किसी भी ब्लड बैंक का निरीक्षण नहीं किया गया था। कैग द्वारा सदन में पेश की गई रिपोर्ट में ये खामियां पाई गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय रक्त नीति के अनुसार एसबीटीसी को राज्य स्तर पर रक्त कार्यक्रम के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार बनाया गया था। बावजूद इसके एससबीटीसी इस दिशा में गंभीर नजर नहीं आया। स्थिति यह हुई कि राज्य के ब्लैंड बैंकों में 100 प्रतिशत स्वैच्छिक रक्तदान के सापेक्ष 48 से 53 प्रतिशत रक्त इकाई ही जमा की जा सकी।
एसबीटीसी गवर्निग बॉडी ने भी वर्ष में छह बैठक के सापेक्ष केवल दो बैठकें की। यहां तक की सूचना, शिक्षा और संचार की गतिविधियों पर भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। ब्लैड बैंकों की स्थिति यह रही कि 13 ब्लड बैंक एक्सपायर्ड लाइसेंस पर चल रहे थे। इनमें जिला अस्पताल पिथौरागढ़ का लाइसेंस 20 साल पहले और उत्तरकाशी ब्लड बैंक का लाइसेंस 10 साल पहले समाप्त हो चुका था। 
इन्होंने निरीक्षण के दौरान उठाई गई खामियों को भी दूर नहीं किया। ब्लड बैंकों के लाइसेंस को नवीनीकरण करने में भी खासी अनियमितताएं पाई गई। यहां तक कि इनमें एचआइवी के खिलाफ जांच के लिए उपयुक्त उपकरणों का इस्तेमाल नहीं किया गया। इस संबंध में कैग ने शासन को जून 2018 में पत्र भी लिखा था, जिसका जवाब अगस्त 2019 तक नहीं मिल पाया था।

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