देहरादून, कुशल कोठियाल। बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम जैसे राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणामों के बीच कोई उत्तराखंड विधानसभा की एक सीट के उप चुनाव के परिणाम का गहन विश्लेषण करने लगे तो पहली नजर में यह अनपेक्षित लग सकता है। हालांकि यह भी सच है कि राजनीति में छोटे-छोटे संकेतों के बड़े फलितार्थ भी होते हैं। इस तरह के संकेतों की उपेक्षा का खामियाजा कई मर्तबा कई सियासी दलों ने भुगता है।

उत्तराखंड के जिला अल्मोड़ा की सल्ट विधानसभा सीट भारतीय जनता पार्टी के विधायक सुरेंद्र सिंह जीना के निधन के बाद रिक्त हुई थी। पार्टी ने इस सीट पर उनके भाई महेश जीना को चुनाव लड़ाया और जैसी उम्मीद थी, वह चुनाव जीत भी गए। उन्होंने कांग्रेस की गंगा पंचोली को साढे़ चार हजार मतों से पराजित किया। इसे महज भारतीय जनता पार्टी की जीत और कांग्रेस की हार के रूप में देखना चुनाव परिणाम का अतिसरलीकरण ही माना जाएगा।

दरअसल, सत्य तो यह है कि प्रदेश में अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस ने अपने चरम पर विराजमान भाजपा को कड़ी टक्कर दी है। राज्य में ऐतिहासिक बहुमत की सरकार, केंद्र में भी मजबूत सरकार, संगठित और सक्रिय संगठन, स्टार प्रचारकों का मजबूत बेड़ा और साधन बेशुमार। उस पर भी दिवंगत नेता के परिवार के प्रति मतदाताओं की सहानुभूति और जीत का अंतर कुल 4,697 मत। जाहिर है कि सामान्य स्तर की मेधा भी जीत के जश्न के साथ गंभीर चिंतन का सुझाव देती है। भारतीय जनता पार्टी जैसी राजनीतिक पार्टी में तो हर चुनाव परिणाम के बाद विचार-मंथन की परंपरा रही है।

इस बार अगर इस परिणाम को जीत के जश्न तक ही सीमित रखते हैं तो इससे आठ-नौ माह बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के प्रति पार्टी का अति आत्मविश्वास ही छलकेगा। हालांकि भाजपा इस उपचुनाव परिणाम से सतर्कता के साथ संतोष भी कर सकती है। कांग्रेसियों ने सरकार के प्रति एंटी इनकंबेंसी का जिस तरह हौवा बनाया हुआ है, उसकी डिग्री वास्तव में इतनी नहीं है कि बिना कुछ किए ही अगले विधानसभा चुनाव में सत्ता कांग्रेस को थाली में सजी मिल जाए।

यह सही है कि वर्तमान में प्रदेश में विपक्ष कांग्रेस ही है, अन्य पार्टियों में से किसी को भी कांग्रेस का विकल्प बनने में समय व शक्ति लगेगी। कांग्रेस उत्तराखंड में बुरे दौर में गुजर रही है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। पार्टी के ज्यादातर दिग्गज भारतीय जनता पार्टी सरकार में जमे हैं, जो बचे हैं वे एक-दूसरे की टांग खींचने में ज्यादा रुचि ले रहे हैं। न सर्वसम्मत नेता और न सक्रिय संगठन। फिर भी कांग्रेस है कि अगले चुनाव में सरकार बना लेने के प्रति आश्वस्त है। 

इस भरोसे का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री को लेकर पार्टी नेताओं में अभी से भीतर-बाहर खुली झड़प होती रहती है। कुछ न होते हुए भी इस स्तर के विश्वास के पीछे कुछ न कुछ ऐसा जरूर है जो कांग्रेसियों को पता है, लेकिन सत्ताधारियों को इसका भान नहीं। सल्ट का चुनाव परिणाम भी कांग्रेसियों के इस भरोसे को कुछ आधार तो देता ही है। सल्ट में कांग्रेसियों में प्रत्याशी को लेकर असहमति दिख रही थी। स्थानीय स्तर पर पार्टी का एक मजबूत खेमा तो इस उपचुनाव को राष्ट्रीय महासचिव हरीश रावत को जमीन दिखाने के मौके के रूप में ले रहा था। 

प्रदेश के कुछ बड़े नेताओं ने केवल हाजिरी लगाई, तो कुछ ने पूरी ताकत। उपचुनाव के सभी समीकरण भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में होने के बावजूद कांग्रेस प्रत्याशी का अच्छी टक्कर देना, हारने के बावजूद कांग्रेसियों का मनोबल तो बढ़ाता ही है। इसी तरह जीतने के बावजूद यह उपचुनाव परिणाम भारतीय जनता पार्टी को मंथन के लिए जमीन पर बैठने की सलाह भी दे रहा है। पार्टी के नेताओं को इसे समझते हुए ही आगे की रणनीति बनानी चाहिए। 

[राज्य संपादक, उत्तराखंड]

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