जागरण संवाददाता, ऋषिकेश :

साहित्यिक संस्था आवाज ने हिन्दी साहित्य शिरोमणी पार्थसारथी डबराल की जयंती पर उनको श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए भावपूर्ण स्मरण किया।

इस अवसर पर शिक्षाविद् एवं साहित्यकार देवेंद्रदत्त सकलानी ने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा कि स्वनामधन्य कवि पार्थसारथी डबराल का जन्म 25 फरवरी 1936 में पौड़ी गढ़वाल के तिमली ग्राम में हुआ था। छायावाद का उन पर गहरा प्रभाव था। प्रयोगवाद से नई कविता तक उनका सफर एक सफल प्रयोगधर्मी कवि के रूप में अग्रणी रहा। वे प्रकृति और मानव की अभिव्यक्ति के संवेदनशील कवि होने के साथ-साथ संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे।

साहित्यिक संस्था आवाज के अध्यक्ष अशोक क्रेजी एवं महा सचिव धनेश कोठारी ने कहा कि डॉ. डबराल नवोदित रचनाकारों के लिए हमेशा सहयोगी रहे। आवाज साहित्यिक संस्था उन्हीं की छत्रछाया में पली और बडी हुई। गंभीरता के साथ हास -परिहास के लिए भी उन्हें हमेशा याद किया जाता रहेगा। छोटी-छोटी बातों को भी वे हास्य परिहास का कलेवर पहना देते थे और आदमी के चेहरे में मुस्कान ला देते थे। संस्था के उपाध्यक्ष एवं पार्थसारथी डबराल के शिष्य प्रबोध उनियाल ने डबराल की एक महत्वपूर्ण रचना'झुक नहीं सकता हिमालय का शिलोच्चय भाल हूं मैं ,एक हिन्दी का सफल भूचाल हूं, डबराल हूँ मैं का सस्वर वाचन किया साथ ही उनके कई संस्मरणों को साझा किया। इस अवसर पर आचार्य रामकृष्ण पोखरियाल ने कविताओं की काव्यांजलि देते हुए उनका स्मरण किया। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार महेश चिटकारिया, सत्येंद्र चौहान, नरेंद्र रयाल, शिव प्रसाद बहुगुणा, डॉ सुनील दत्त थपलियाल, धनीराम बिजोला, मनोज मलासी, रवि शास्त्री व आलम मुसाफिर आदि उपस्थित थे।

Posted By: Jagran

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