देहरादून, राज्य ब्यूरो। पानी की जितनी खपत, उतना ही बिल। इसे लेकर श्रीनगर में प्रत्येक पेयजल कनेक्शन पर की गई मीटरिंग की व्यवस्था के सकारात्मक नतीजे आए हैं। इस पहल से श्रीनगर में पानी की खपत में 20 फीसद की कमी आई, जबकि राजस्व में 40 फीसद की बढ़ोतरी हुई। साथ ही नलकूपों व पेयजल योजनाओं के रखरखाव की मद में भी कमी दर्ज की गई। इससे उत्साहित शासन अब प्रदेश के 38 शहरों में भी ऐसी ही व्यवस्था करने जा रहा है।

एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक (एआइआइबी) से वित्त पोषित उत्तराखंड नगरीय जलापूर्ति परियोजना के तहत इन शहरों में पर्याप्त जलापूर्ति के साथ ही हर कनेक्शन पर मीटर लगाने की तैयारी है। सचिव पेयजल अरविंद हयांकी के अनुसार चार साल के भीतर इन सभी शहरों में मीटरिंग कर दी जाएगी।

गुणवत्तायुक्त व पर्याप्त जलापूर्ति के साथ ही पानी की किफायत को लेकर शासन सक्रिय हुआ है। उत्तराखंड नगरीय जलापूर्ति परियोजना में भी इस पर खास फोकस किया गया है, ताकि लोग पानी के महत्व को समझें और उतना ही खर्च करें जितने की जरूरत है।

सचिव पेयजल अरविंद हयांकी बताते हैं कि परियोजना के तहत 38 शहरों में प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन 135 लीटर की दर पर न्यूनतम 16 घंटे और 12 मीटर प्रेशर के साथ पेयजल सुलभ होगा। साथ ही प्रत्येक पेयजल कनेक्शन पर मीटर लगाए जाएंगे। इससे पेयजल का अपव्यय रुकेगा और जलस्रोतों पर दबाव भी घटेगा। यही नहीं, लोग भी पानी के महत्व को समझेंगे और जरूरत के हिसाब से ही खर्च करेंगे। यह लोगों को जागरूक करने की दिशा में भी कदम होगा।

परियोजना में शामिल शहर

  • जिला - शहर
  • पिथौरागढ़ - बेरीनाग, गंगोलीहाट
  • बागेश्वर -   बागेश्वर
  • अल्मोड़ा -   अल्मोड़ा, भिकियासैंण, रानीखेत, द्वाराहाट
  • चमोली -   गैरसैण, थराली, नंदप्रयाग, जोशीमठ, पीपलकोटी, गोपेश्वर
  • उत्तरकाशी -  बड़कोट, चिन्यालीसौड़, पुरोला, नौगांव
  • टिहरी -    चमियाला, चंबा, घनसाली, लंबगांव, कीर्तिनगर, नई टिहरी
  • रुदप्रयाग -  तिलवाड़ा, रुद्रप्रयाग, ऊखीमठ, अगस्त्यमुनि
  • चंपावत -  लोहाघाट
  • नैनीताल -  भवाली, भीमताल, कालाढूंगी
  • ऊधमसिंहनगर -  जसपुर
  • हरिद्वार -    पिरान कलियर, शिवालिकनगर, भगवानपुर, लक्सर, लंढौरा, झबरेड़ा

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परियोजना के मुख्य बिंदु

  • 1258 करोड़ है इस परियोजना की कुल लागत
  • परियोजना में शामिल 38 शहरों की 556862 आबादी होगी लाभान्वित
  • पेयजल के वास्तविक उपयोग के अनुसार ही देना होगा जल मूल्य
  • योजनाओं में ऊर्जा की कम खपत वाले पंप लगेंगे
  • ट्यूबवेल व पंपिंग स्टेशनों में ऑटोमैटिक नियंत्रक पद्धति का होगा उपयोग
  • पेयजल की उपलब्धता होने पर पर्वतीय क्षेत्र के नगरों से पलायन पर लगेगा अंकुश

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