ऋषिकेश, [हरीश तिवारी]: अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश में विभिन्न पदों के लिए जमा कराए गए आवेदनों में से दो हजार के करीब हाईवे के किनारे लावारिस हालात में पड़े मिले। इनके साथ आवेदकों के शैक्षिक और अनुभव प्रमाणपत्र भी संलग्न थे। नेपाली फार्म से देहरादून जाने वाले बाईपास मार्ग पर लालतप्पड़ से कुछ आगे सड़क के किनारे बुधवार को जब फाइल और उसमें रखे प्रपत्रों का ढेर लोगों को नजर आया तो भीड़ जमा हो गई। इनमें स्टाफ नर्स से लेकर वायरमैन व कुछ अन्य पदों के आवेदन शामिल हैं। कुछ आवेदनों में अस्थायी नियुक्ति की संस्तुति की टिप्पणी के साथ संस्थान की मुहर भी लगी है। यह सभी आवेदन आउटसोर्स कंपनी से जुड़े हैं।

एम्स के भीतर रोजगार पाने के लिए वर्ष 2014 में सैकड़ों लोगों ने आवेदन किया। मगर विज्ञप्ति निरस्त कर दी गई। अभी इन आवेदकों से वसूले गए आवेदन शुल्क के लाखों रुपयों का मामला निपटा नहीं है। अब एक नया और गंभीर मामला सामने आया है। इस वर्ष एम्स में आउटसोर्सिंग एजेंसी के जरिये विभिन्न पदों के लिए अस्थायी नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की गई थी। 

नियुक्ति प्रक्रिया में कई तरह के आरोप-प्रत्यारोप लगे। तत्कालीन आउटसोर्स एजेंसी मास मैनेजमेंट सर्विस प्राइवेट लिमिटेड का कार्यकाल इसी साल चौदह नवंबर को समाप्त हो गया है। बुधवार को हरिद्वार-देहरादून बाईपास मार्ग पर लालतप्पड़ और भानियावाला तिराहा के बीच सड़क के किनारे आवेदन पत्रों का ढेर लगा मिला। 

आसपास के लोगों ने इन्हें  देखा तो यह सभी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश में अस्थायी पदों के लिए आवेदन करने वाले आवेदकों के थे। इनकी संख्या दो हजार के करीब है। इनमें कुछ आवेदन मास मैनेजमेंट सर्विस प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंधक द्वारा सहायक प्रशासनिक अधिकारी एम्स को संबोधित हैं। अस्थायी नियुक्ति के आदेश सहित एम्स की मुहर और संबंधित अधिकारी के हस्ताक्षर भी इन पर है। जबकि कुछ आवेदनों पर मुहर नहीं हैं।

कई आवेदनों में राज्य के मंत्रियों की संस्तुति का भी जिक्र किया गया है। एम्स के भीतर अस्थायी नियुक्ति से जुड़े आवेदन पत्रों का इस तरह सड़क किनारे पाया जाना व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है। अस्पताल प्रशासन और आउट सोर्सिंग एजेंसी दोनों ही इस मामले में एक दूसरे के पाले में गेंद को सरका रहे हैं।

आवेदकों की आइडी का हो सकता है दुरुपयोग 

लावारिस मिले प्रपत्रों में आवेदकों के आधार पत्र व अन्य आइडी की छायाप्रति भी शामिल है। यह आइडी अगर गलत हाथों में पड़ जाए और उसका दुरुपयोग भी हो सकता है। यह बात साफ है कि जिन लोगों को नियुक्ति मिली है उनकी फाइल एम्स के संबंधित विभाग के पास होनी चाहिए और जिन्हें नहीं मिली है उन आवेदकों की फाइल आउटसोर्सिंग कंपनी के पास होनी चाहिए। 

उप निदेशक (प्रशासन एम्स) अंशुमान गुप्ता का कहना है कि आवेदन पत्रों का लावारिस मिलना जांच का विषय है। आउटसोर्सिंग एजेंसी के जरिये अस्थायी नियुक्तियां की जाती हैं। संबंधित रिकॉर्ड उक्त एजेंसी के अधीन होते हैं न कि एम्स के। यदि किसी आवेदन पत्र पर एम्स के विभाग की मुहर लगी है तो संभवत: यह आवेदन नियुक्ति पत्र जारी होने के बाद ज्वाइन न करने वाले आवेदकों के भी हो सकते हैं।

उत्तराखंड प्रभारी(मास मैनेजमेंट सर्विस प्राइवेट लिमिटेड) देवेश नौटियाल का कहना है कि एम्स के साथ हमारी एजेंसी का अनुबंध समाप्त हो गया है। एम्स प्रशासन की मांग पर एजेंसी ने विभिन्न पदों के लिए आवेदन मांगे थे। जिन पदों के लिए अभ्यर्थियों का चयन हुआ। उनकी फाइल एम्स के विभाग को भेज दी गई है। एजेंसी के पास वही आवेदन शेष रह गए जिन्हें नियुक्ति नहीं मिल पाई। यह आवेदन निष्प्रयोज्य हैं। 

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Posted By: Sunil Negi

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