एआई के भरोसे बच्चे, छूटा दिमाग लगाना... होमवर्क एक्सीलेंट लेकिन एग्जाम ने खोली पोल
बच्चों में गृहकार्य के लिए एआई पर बढ़ती निर्भरता उनकी स्वतंत्र सोच और समस्या-समाधान कौशल को प्रभावित कर रही है।


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अंकुर अग्रवाल, देहरादून। सवाल सामने आते ही अब बच्चे किताब नहीं, मोबाइल खोलते हैं। गणित का सवाल हो, विज्ञान की अवधारणा या निबंध लिखने की चुनौती, कुछ सेकंड में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तैयार जवाब सामने रख देती है।
गृहकार्य पूरा हो जाता है, समय भी बच जाता है, लेकिन इस आसानी में बच्चे खुद कितना सीख रहे हैं। यही सवाल अब शिक्षा जगत के सामने नई चुनौती बनकर खड़ा है। उत्तर खोजने, तर्क लगाने और गलती से सीखने की जगह यदि तैयार जवाब हासिल करना आदत बन जाए, तो पढ़ाई का उद्देश्य ही पीछे छूटने लगता है।
देश के अन्य शहरों की तरह देहरादून भी इस बदलती प्रवृत्ति से अछूता नहीं है। यहां विद्यार्थियों की डिजिटल निर्भरता के बीच असली चिंता यह है कि तकनीक उनकी स्वतंत्र सोच व समस्या सुलझाने के अभ्यास का विकल्प बन रही है।
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मनोचिकित्सक एवं काउंसलर डा. स्वाति मिश्रा के अनुसार एआई से तैयार उत्तर लिखकर गृहकार्य पूरा करना व विषय को वास्तव में समझना दो अलग बातें हैं। बच्चा यदि सवाल का हल खुद निकालने के बजाय सीधे उत्तर कापी करता है, तो उसे सही जवाब तो मिल सकता है, लेकिन उसे वहां तक पहुंचने की प्रक्रिया का अभ्यास नहीं मिलता। डा. मिश्रा के अनुसार यही अंतर परीक्षा में सामने आ सकता है। प्रश्न का स्वरूप बदलते ही या उत्तर का तर्क पूछे जाने पर विद्यार्थी अटक सकता है, क्योंकि उसने विषय समझने के बजाय जवाब जुटाने पर ध्यान दिया था।
एआई की मदद से बढ़े अंक, लेकिन परीक्षा में पिछड़े
अमेरिका के पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों के शोधकर्ताओं ने करीब एक हजार हाईस्कूल विद्यार्थियों पर गणित विषय में क्षेत्रीय प्रयोग किया। शोध के निष्कर्ष 2025 में प्रतिष्ठित शोध पत्रिका प्रोसीडिंग्स आफ द नेशनल एकेडमी आफ साइंसेज (पीएनएएस) में प्रकाशित हुए।
प्रयोग के दौरान सामान्य चैटजीपीटी जैसे एआई सहायक की मदद से अभ्यास करने वाले विद्यार्थियों के अंक बेहतर हुए, लेकिन जब परीक्षा में एआई की सुविधा हटा दी गई, तो उनका प्रदर्शन बिना एआई अभ्यास करने वाले विद्यार्थियों की तुलना में 17 प्रतिशत कम रहा। शोध का निष्कर्ष था कि बिना उचित मार्गदर्शन के एआई पर निर्भरता सीखने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है।
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सहायक बने एआई, दिमाग का विकल्प नहीं
सीबीएसई की काउंसलर डा. सोना कौशल के अनुसार एआई का इस्तेमाल अपने आप में नुकसानदेह नहीं है। बच्चा पहले सवाल हल करे और फिर तकनीक से अपने उत्तर की जांच कराए, तो सीखने में मदद मिल सकती है। मुश्किल अवधारणा को सरल भाषा में समझना और अतिरिक्त उदाहरणों से अभ्यास करना भी उपयोगी है।
परेशानी तब शुरू होती है, जब हर सवाल का जवाब पाने के लिए बच्चा अपना प्रयास ही छोड़ देता है। शिक्षक और अभिभावकों को केवल पूरा गृहकार्य देखने के बजाय यह भी परखना होगा कि बच्चा उत्तर को समझता है या नहीं। कक्षा में मौखिक सवाल, बिना डिजिटल सहायता के अभ्यास और अपनी भाषा में उत्तर लिखने की आदत इस निर्भरता को पहचानने में मदद कर सकती है।
