देहरादून, विकास गुसाईं। एक अदद आवास हर व्यक्ति का सपना होता है। अपना आवास, जहां वह बिना किसी पर बोझ बने रह सकता है। प्रदेश के कई लोगों ने भी यह सपना देखा। योजना थी सभी ग्रामीण आवासहीन परिवारों को अदद आवास दिलाने की। कई लोगों के सपने पूरे भी हुए। बावजूद इसके अभी भी प्रदेश में हजारों परिवार ऐसे हैं, जो एक अदद छत का इंतजार कर रहे हैं। इनकी संख्या 94 हजार से अधिक है।

ये वे लोग हैं जो प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) में शामिल होने से रह गए। इन परिवारों का पंजीकरण भी किया गया था। बावजूद इसके कतिपय कारणों से आवास नहीं मिल पाया। इसके लिए उन्होंने प्रदेश सरकार का दरवाजा भी खटखटाया। मामले का परीक्षण किया गया तो बात सत्य पाई गई। इन्हें आवास का लाभ देने के लिए प्रदेश सरकार ने केंद्र का दरवाजा भी खटखटाया। बावजूद इसके अभी तक इसकी अनुमति नहीं मिल पाई है। 

स्मृतियों में कैद स्मृति वन

केदारनाथ आपदा में काल का ग्रास बनने वालों की याद में स्मृति वन बनाने का निर्णय लिया गया। योजना बनाई गई आपदा की त्रासदी दर्शाने के साथ ही यहां मिली अंतिम निशानियों को प्रदर्शित करने की। इसे डार्क टूरिज्म के तौर पर प्रचारित किया जाना था। इसके पीछे विश्व में बढ़ रहे डार्क टूरिज्म के क्रेज को केंद्र में रखा गया। माना गया कि जिस प्रकार अमेरिका के ट्विन टावर पर हुए आतंकी हमले के बाद उस जगह, यानी ग्राउंड जीरो पर प्रतिवर्ष सैकड़ों लोग यहां मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने आते हैं, उसी तरह केदारनाथ में भी लोग अपनों को याद करने के लिए आएंगे। इसके लिए स्मृति वन में त्रासदी की जानकारी के साथ ही यहां मिली वस्तुओं को प्रदर्शित करने और अपनों की याद में पौधे रोपे जाने थे। इसके लिए जगह भी चिह्नित की गई लेकिन स्मृति वन अब तक धरातल पर नहीं उतर पाया।

सेटेलाइट नक्शे की भटकी दिशा

उत्तराखंड का सेटेलाइट नक्शा। यानि एक क्लिक पर प्रदेश के किसी भी हिस्से के बारे में जानकारी सामने स्क्रीन पर उपलब्ध। तकरीबन 50 साल के इंतजार के बाद इस सेटेलाइट नक्शे के पूरा होने की उम्मीद जगी। इस सपने को पूरा करना था सर्वे ऑफ इंडिया ने। बाकायदा पूरी कार्ययोजना भी बनाई गई। इसके लिए धरातल के साथ ही एरियल चित्र लिए जाने थे। हर छोटी, बड़ी जगह को इसमें दर्शाया जाना था। इतना ही नहीं, नक्शे में पूरे राजस्व अभिलेखों का भी जिक्र होना था। इस डिजिटल नक्शे में यह तक देखा जा सकता था कि कौन सा खसरा नंबर कहां पर है और किसके नाम है। योजना बड़ी थी। इस क्रम में पहले दो साल तक सर्वे ऑफ इंडिया और प्रदेश सरकार के बीच वार्ताओं का दौर चला। बात एमआयू साइन करने तक तो पहुंची, लेकिन अफसोस इस पर आज तक बात इससे आगे नहीं बढ़ पाई है।

मोबाइल अस्पताल के पहिये जाम

प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को गति देने के लिए एक योजना बनाई गई। ग्यारह वर्ष पूर्व तैयार की गई इस योजना के अनुसार हर जिले में मोबाइल अस्पताल खोले जाने थे। स्वास्थ्य संबंधी जरूरी उपकरणों से लैस एक वैन चिकित्सकों समेत हर जिले में जगह-जगह जानी थी। मकसद यह कि सरकारी अस्पतालों का बोझ घटेगा और जरुरतमंदों को राहत मिल सकेगी।

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योजना जोर-शोर से शुरू हुई। शुरुआती दौर में पिथौरागढ़, चंपावत, अल्मोड़ा, उत्तरकाशी और पौड़ी, पांच पर्वतीय जिलों में इसका संचालन शुरू किया गया। शेष जिलों में भी इसके संचालन की बात कही गई। सभी जिलों की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए 15 और मोबाइल यूनिट खरीदने का निर्णय लिया गया। इसके लिए निविदा प्रक्रिया भी शुरू की गई। इसके बाद सरकार ने अपना जोर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की मजबूती पर लगा दिया। नतीजतन, मोबाइल अस्पताल योजना अब पूरी तरह ठंडे बस्ते में चली गई है।

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Posted By: Raksha Panthari

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