देहरादून, किरण शर्मा। ‘घर का जोगी जोगड़ा आन गांव का सिद्ध।’ रोजी-रोटी की तलाश में पहाड़ से दूसरे शहरों में गए सैकड़ों लोगों का अब यह कहावत समझ आने लगी है। पौड़ी गढ़वाल जिले के नैनीडांडा ब्लाक के सतेंद्र सिंह 12 साल से दिल्ली की एक निजी कंपनी में नौकरी कर रहे थे। कोरोना संकट को देखते हुए मार्च में वह गांव लौट आए। गांव आकर वह खाली नहीं बैठे 20 बकरियां खरीदीं। उन्होंने स्वरोजगार की तरफ इस उम्मीद में कदम बढ़ाए हैं कि दिल्ली से तो बेहतर ही कमा लेंगे। पड़ोस के खेतू गांव के गणोश भी इसी राह पर कदम बढ़ा रहे हैं। वह भी उत्तर प्रदेश के साहिबाबाद में करीब 20 वर्षों से एक कंपनी में काम कर रहे थे। पलायन आयोग के अनुसार करीब 59 हजार लोग कोरोना काल में अपने गांव लौटे हैं। आयोग को उम्मीद है कि 30 फीसद भी रुक गए तो गांव गुलजार हो जाएंगे।

पहाड़ की नियति

इलाज के अभाव में पथरीली पगडंडियों पर दम तोड़ना दूर-दराज गांवों के लोगों की नियति बन गया है। इनके लिए बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं इक्कीसवीं सदी में भी किसी सपने से कम नहीं हैं। उत्तरकाशी के गंगाड़ गांव की एक गर्भवती को लचर व्यवस्था ने जो जख्म दिया, उसे वह ताउम्र शायद ही भुला पाए। प्रसव पीड़ा की कराह के बीच जिस खुशी की आस में चौदह किलोमीटर पगडंडियां नापी, वह आंसुओं के साथ विदा हो ली। विवाहिता को समय पर उपचार नहीं मिल पाया, हस्र वही हुआ जो होता आया है। कोख में पल रहा बच्चा, दुनिया देखे बिना ही चल बसा और मां के आंचल में रह गया जिंदगीभर न भूलने वाला गम। उसकी अपनी जान पर बन आई सो अलग। ऐसा ही कुछ सच है पहाड़ का। सरकार के दावे सुन अब लोगों को चिढ़ सी होने लगी है। पता नहीं कब टूटेगा मौत का ये सिलसिला ..।

लकीर के फकीर

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय।’ संत कबीर ने करीब आठ सौ वर्ष पहले ही समझ लिया था कि सिर्फ किताबें पढ़ने कोई पंडित नहीं हो जाता। कुछ ऐसा ही देखने को मिला उत्तरकाशी जिले में। ‘कर्तव्य पराणयता’ का हाल देखिए होम क्वारंटाइन के उल्लंघन में राजस्व पुलिस ने छह माह और तीन साल के दो बच्चों पर मुकदमा दर्ज कर दिया। बच्चे के माता-पिता पर तो केस होना ही था। जबकि नियमानुसार बारह वर्ष तक के बच्चे पर केस दर्ज नहीं किया जा सकता। खैर, जिलाधिकारी ने कोविड-19 मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी संभाल रहे सहायक अभियंता को निलंबित कर दिया, लेकिन सवाल वही है कि क्या हमारे अफसर वास्तव में नियमों को लेकर इस कदर संजीदा हैं कि उन्होंने दो बच्चों पर मुकदमा करने से भी गुरेज नहीं किया। आखिर इतनी तो समझ उन्हें भी रही होगी कि अबोध दुधमुंहे बच्चों का इसमें क्या दोष। नियमों की व्यवहारिकता भी देखी जानी चाहिए।

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शहर से अच्छे गांव

शहरों से तो गांव ही अच्छे हैं। लॉकडाउन के नियमों का पालन जिस अंदाज में गांव कर रहे हैं, उससे शहर के लोगों को भी सीखने की जरूरत है। लॉकडाउन तोड़ने के सर्वाधिक मुकदमे शहरी क्षेत्रों में ही दर्ज किए गए हैं। रुद्रप्रयाग के पास अगस्त्यमुनि क्षेत्र में कोट गांव के रहने वाले सूरज कुमार इसकी मिसाल हैं। 20 अप्रैल को उनकी शादी थी और प्रशासन ने बरात में जाने के लिए पांच लोगों की अनुमति दी थी, लेकिन सूरज कार चालक समेत केवल तीन बराती ही ले गए। उनका कहना था कि वापसी में दुल्हन भी आएगी इसीलिए पिता और भाई के साथ केवल वही दुल्हन के गांव गए। चमोली जिले के रामणी गांव को ही लीजिए ग्रामीणों ने प्रवेश द्वार पर एक बैरियर बना लिया है और किसी को भी गांव में प्रवेश करने पहले उसके बारे में तहकीकात की जाती है। गांवों के इस समर्पण को सलाम।

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Posted By: Sunil Negi

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