देहरादून, राज्य ब्यूरो। Jagran Safe Traffic Week प्रदेश में हर साल सैकड़ों लोग असमय ही काल का ग्रास बन रहे हैं। बीते तीन सालों में 2815 व्यक्तियों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हुई है। यानी, हर साल औसतन 950 मौत। सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली ये मौतें न केवल उनके परिवारों पर भारी पड़ रही हैं, बल्कि प्रदेश में सड़क सुरक्षा के दावों पर भी सवालिया निशान लगा रही हैं। सबसे चिंताजनक यह कि कुल सड़क दुर्घटनाओं की 85 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाएं चार मैदानी जिलों में हुई हैं।

उत्तराखंड में यूं तो हर साल प्राकृतिक आपदाएं आती हैं, लेकिन सड़क दुर्घटना एक ऐसी आपदा है, जिस पर यदि समय रहते कार्य किया जाए तो इसके प्रभाव को काफी कम किया जा सकता है। सड़क दुर्घटनाओं का ग्राफ बीते तीन वर्षों में थोड़ा गिरा जरूर है, लेकिन इसमें अभी और अधिक कार्य करने की जरूरत है। प्रदेश में दुर्घटनाओं के बीते तीन वर्षों के आंकड़े देखे जाएं तो वर्ष 2017 में 1603 दुर्घटनाएं, वर्ष 2018 में 1468 दुर्घटनाएं और वर्ष 2019 में 1352 दुर्घटनाएं हुई हैं। इनमें वर्ष 2017 में 942 व्यक्तियों की मौत और 1631 घायल हुए। वर्ष 2018 में सड़क दुर्घटनाओं में 1047 व्यक्तियों की मौत हुई और 1571 घायल हुए। वहीं, वर्ष 2019 में 867 लोगों की मौत हुई और 1457 घायल हुए। प्रदेश में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में सबसे अधिक मामले प्रदेश के चार मैदानी जिलों में आए हैं। 

बीते वर्ष देहरादून में सर्वाधिक 328, ऊधमसिंह नगर में 327, हरिद्वार में 300 और नैनीताल में 197 सड़क दुर्घटनाएं हुई हैं। यह कुल सड़क दुर्घटनाओं का 85 प्रतिशत है। ये चारों जिले ऐसे हैं, जहां यातायात से जुड़े दोनों अहम विभाग, यानी परिवहन और पुलिस का पूरा अमला बैठता है। बात करें वर्ष 2020 की, तो कोरोना के कारण लागू लॉकडाउन की अवधि में वाहनों का संचालन बेहद कम हुआ। इस कारण दुर्घटनाओं में कमी दर्ज की गई। वर्ष 2020 के अक्टूबर तक के आंकड़ों पर नजर डालें, तो अभी तक 796 सड़क दुर्घटनाएं हुई हैं और इनमें 519 की व्यक्तियों की मौत हुई है, जबकि 1334 घायल हुए हैं। 

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