राज्य ब्यूरो, देहरादून: मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर के भूमिपूजन और शिलान्यास के अवसर पर कहा कि यह एक सपने का पूरा होना जैसा है। कई वर्षो के संघर्ष के बाद यह स्वर्णिम अवसर आया है। हजारों लोगों ने मंदिर निर्माण के लिए बलिदान दिया। आज उनका संघर्ष स्वरूप ले रहा है। केंद्र व उत्तर प्रदेश सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति से ऐसा हुआ है। देश व प्रदेश में दीपावली सा माहौल है। उन्होंने कहा कि उनकी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बात हुई है, वह भी जल्द आयोध्या जाकर रामलला के दर्शन करेंगे और मंदिर के स्वरूप को देखेंगे।

बुधवार को मीडिया से बातचीत में मुख्यमंत्री ने सभी प्रदेशवासियों को मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि देश और अयोध्या में सैकड़ों परिवार ऐसे हैं, जो काफी समय से अखंड रामायण का पाठ एवं रामधुन कर रहे हैं। वर्ष 1989 में मंदिर निर्माण के लिए आंदोलन बहुत तीव्र हुआ था। सब लोग इसके लिए जनजागरण भी करते थे। उस समय आमजन से मंदिर निर्माण के लिए सवा रुपये लिए जाते थे। यह कहा जाता था कि एक पत्थर आपके नाम का भी लग जाएगा। उत्तरकाशी के दूरस्थ गांव लिवाड़ी-खिताड़ी से 18 किलोमीटर पैदल चलकर लोग श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए शिला लेकर आए थे। जगह-जगह कारसेवा की गई। श्रीराम मंदिर के भूमि पूजन से आंदोलन में शिरकत करने वाले जीवित लोग खुश होंगे, जो दिवंगत हो गए उनकी आत्मा को शांति मिलेगी। उन्होंने कहा कि प्रचारक मोरोपंतजी पिंगले, अशोक सिंघल, महंत अवैद्यनाथ एवं कोठारी बंधुओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राममंदिर निर्माण से पहले यह आशंका रहती थी कि कहीं विरोध न हो या कहीं माहौल खराब न हो जाए। आज स्थिति यह है कि विरोध करने वाले अब समर्थन कर रहे हैं। सारा समाज इस मामले में एक हो गया है।

वेश बदलकर आंदोलन में लिया हिस्सा

अपने संस्मरण को साझा करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि आंदोलन के समय संघ के प्रचारक के रूप में वह मेरठ में थे। इस दौरान वह वेश बदलकर एक इंस्पेक्टर के घर पर किराए पर रहते थे। उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार उन्हें ढूंढ रही थी। वह वेश बदलकर ही अयोध्या तक पहुंचे थे और कारसेवा में हिस्सा लिया।

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सीता माता का उत्तराखंड से गहरा नाता

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि माता सीता का उत्तराखंड से गहरा नाता है। यहां विदाकोटी नामक स्थान पर लक्ष्मण जी ने माता सीता को विदा किया था। वहां आज लक्ष्मण मंदिर है। इसी के कुछ आगे मूच्छयाली गांव हैं, जहां की आराध्या देवी सीता मैया हैं। शायद देश का यह एक ही गांव होगा, जहां उन्हें आराध्य देवी के रूप में पूजा जाता है। माता सीता ने यहीं सितोनस्यूं पट्टी के फल्सवाड़ी में भू-समाधि ली। यहां माता सीता का मंदिर है। उन्होंने कहा कि पहाड़ के किसी गांव में वाल्मीकि मंदिर नहीं, लेकिन इसी स्थान के पास वाल्मीकि मंदिर है। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि यहीं माता सीता ने भू-समाधि ली थी।

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