देहरादून, जेएनएन। दून की रहने वाली साइना और अनिला सिद्दीकी आत्मनिर्भर भारत अभियान को न केवल बढ़ावा दे रही हैं, बल्कि स्वदेशी हैंडलूम योजना को मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर रहीं हैं। दोनों बहनें अपने हुनर के दम पर न केवल स्वरोजगार से जुड़ी हैं, बल्कि वह अपने आसपास की 23 घरेलू महिलाओं को रोजगार भी दे रही हैं।

साल 2015 में दोनों बहनों ने जिला उद्योग विभाग से हस्तशिल्प कुटीर उद्योग शुरू करने के लिए प्रधानमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत ऋण लिया। सिद्दीकी सिस्टर्स घर पर ही आकर्षक डिजाइन के वस्त्र, खिलौने, सजावटी सामान बना रही हैं। कार्यकुशल बनने के लिए उन्होंने महिला स्वयं सहायता समूहों के कई कार्यक्रमों में भाग लिया। जहां उन्होंने हस्तशिल्प की नई-नई विधाओं को सीखा। मेहनत के दम पर आगे बढ़ते हुए दोनों बहनों ने वर्ष 2018 में अपने स्टॉल पर वस्त्रों को भी रखना शुरू किया।

अब सिद्दीकी सिस्टर्स के नाम से आइटी पार्क स्थित दून हाट में भव्य मॉडल डिजाइन गारमेंट्स का कलेक्शन है, जिसमें पांच से सात लाख रुपये की लागत के वस्त्र और अन्य सामग्री विक्रय के लिए रखी गई है। दोनों बहनों का लक्ष्य है कि अगले दो साल में वह दो सौ महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ेंगी। वे मानती हैं कि खुद को आत्मनिर्भर बनाना काफी नहीं है, बल्कि अन्य जरूरतमंदों को भी मुख्यधारा में शामिल करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए।

अनिला सिद्दीकी का कहना है कि आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत हमने हस्तशिल्प को बढ़ावा देने का बीड़ा उठाया है। मैं पिछले तीन सालों से स्वरोजगार से जुड़ी हुई हूं और आसपास की महिलाओं को स्वरोजगार के लिए प्रेरित करती हूं। प्रधानमंत्री की स्वरोजगार योजना का महिलाओं को लाभ लेना चाहिए। वहीं, साइना सिद्दीकी कहती हैं कि चायनीज सामान का बहिष्कार कर हमें स्वदेशी को बढ़ाना चाहिए। हम अपने स्टॉल में खिलौने, आकर्षक हैंड बैग, ग्रीटिंग कार्ड, मोतियों की मूर्तियां और महिलाओं के परिधान तैयार कर बेचते हैं। हम स्वरोजगार के साथ आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा दे रहे हैं।

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 हस्तशिल्प कला के लिए है व्यापक बाजार

उत्तराखंड हथकरघा और हस्तशिल्प विकास परिषद की ओर से हर वर्ष परेड ग्राउंड में आयोजित होने वाला नेशनल हैंडलूम एक्सपो हस्तशिल्प कला का व्यापक बाजार है। एक्सपो में देशभर के बुनकर शामिल होते हैं। एक्सपो में विभिन्न राज्यों के शॉल, जयपुरी रजाई, कांजीवरम सिल्क, बनारसी साडिय़ां, बेडशीट, टोपी, कालीन आदि बिक्री के लिए उपलब्ध रहते हैं। हस्तशिल्प कला के कद्रदानों की भी कोई कमी नहीं है। यहां हर साल 15 से 25 करोड़ का कारोबार होता है। 

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