देहरादून, देवेंद्र सती। मानसून की सक्रियता यानि पहाड़ी इलाकों में रहने वालों की नींद हराम। वैसे प्रकृति पर किसी का वश नहीं, पर इतनी सुस्ती कतई अच्छी नहीं। दावे और धरातल का तो जैसे कोई मेल ही नहीं। कुछ ऐसी ही हैं उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन की तैयारियां। जिलों के स्तर पर सेवन डेस्क सिस्टम खोजने पर भी नहीं मिल रही, हां जुबां पर यह शब्द सबकी रटा हुआ है। शुक्र है इस बार मानसून देरी से सक्रिय हुआ और राज्यभर में समान रूप से नहीं बरस रहा। कहीं बारिश आफत बन बरस रही तो कहीं सामान्य से भी कम। खैर, यह तो प्रकृति के अपने रंग हैं, पर सरकारी सिस्टम के रंग-ढंग को देख लोग चिंता में घुले जा रहे हैं। जहां-तहां जान का जोखिम बना हुआ है, पहाड़ की लाइफ लाइन ध्वस्त हैं, मगर जिम्मेदार हरकत में नहीं। वो तो शुक्र है एसडीआरएफ जवानों का, जो हर कहीं देवदूत बनकर पहुंच जा रहे।

गूंगा बहरा है सिस्टम

कहने हैं ना सिस्टम अगर गूंगा बहरा हो जाए तो कुछ नहीं हो सकता है। भले ही किसी की जान ही क्यों चली जाए। कुल मिलाकर भैंस के आगे बीन बजाने का कोई औचित्य नहीं। यही कुछ हुआ टिहरी जिले के ङ्क्षहडोलाखाल इलाके में। यहां सिस्टम के गूंगे बहरेपन ने धर्मसिंह नेगी के परिवार के तीन लोगों को जिंदा दफन करा दिया। गंगोत्री हाईवे पर ऑलवेदर रोड का जो पुश्ता ढ़हकर धर्मसिंह के मकान के ऊपर आ गिरा, उसकी आशंका धर्मसिंह ने शुरुआत में ही जता दी थी। एनएचएआइ और निर्माण करा रही कंपनी के अधिकारियों की चौखट पर ऐडिय़ां रगड़ीं, मिन्नतें की, परिवार की सुरक्षा का वास्ता दिया, पर सिस्टम की आंखें नहीं खुली। नतीजा, धर्म सिंह के हिस्से कभी न भरने वाले जख्म आए। जिम्मेदारों को भला क्या अहसास कि धर्म पर क्या बीत रही होगी। वह उनका अपना थोड़ा ही है, जो उसके बारे में सोचते। धिक्कार ऐसे सिस्टम को।

... तो फिर नेता क्यों

ये नेता जी हैं, नियम-कायदे इनके लिए थोड़ा ही बने हैं। नेता जी, नियम मानने लगे तो फिर किस बात के नेता। सत्तारुढ़ पार्टी भाजपा के एक शीर्षस्थ प्रांतीय नेता कोरोनाकाल में कुछ ऐसा ही जतला रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे नेताजी ने कोरोना से डरने की नहीं, बल्कि उसे डराने की ठान रखी है। तभी है अक्सर निकल पड़ते हैं बगैर मास्क के सियासी डगर पर। शारीरिक दूरी का पालन जैसा शब्द तो शायद नेताजी ने अपनी डिक्शनरी से डिलीट कर दिया है। तभी तो हर सार्वजनिक कार्यक्रमों में कांधे से कांधा मिलाकर खड़े नजर आते हैं। नेताजी ने पिछले हफ्ते हरिद्वार में यह कारनामा किया तो विपक्ष के नेताओं ने खूब तंज कसे। एक रोज पहले राजधानी देहरादून में नेताजी ने फिर वही कारनामा कर दिखाया। पर नेता जी हैं कि ठान रखा है कि चाहे कुछ हो जाए, नियम नहीं मानूंगा। वाकई में अपनी धुन के हैं भी पक्के।

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सैयां भए कोतवाल तो ....

सैया भए कोतवाल तो डर काहे का? यह जुमला इनदिनों राज्यभर में खूब उछल रहा है। निशाने पर है सरकार और उसके कारिंदे। पक्ष और विपक्ष लोकतंत्र के अहम पहलू हैं, एक दूसरे की निगहबानी इनकी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। तर्क-वितर्क, सहमति-असहमति इनके बीच होना लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम पहलू हैं। लेकिन अगर कानून पर अमल को लेकर अंगुली उठे तो ऐसे जुमले उछलेंगे ही। कोरोना काल में भीड़ न जुटाने का नियम सभी के लिए लागू है, पर  इसकी आड़ में डंडा विपक्ष पर ही चल रहा है। ऐसा नहीं कि सत्तापक्ष में सियासी खामोशी है, उसके नुमाइंदे भी भीड़ जुटाने जैसे 'जुर्म' खूब कर रहे हैं, पर कानून के डंडे से एकदम बेफिक्र हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सत्ताधारी दल के लोग कानून से ऊपर हैं? या फिर विपक्ष पर सियासी वार का यह नया तरीका है। खैर... जो भी हो, चिंतन का विषय है।

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