देहरादून, जेएनएन। श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय के एतिहासिक निर्णय और केंद्र सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति के चलते अयोध्या में श्रीराम मंदिर बनने का स्वप्न साकार हो रहा है। राम मंदिर निर्माण से हिंदू समाज की धार्मिक अभीप्साओं और जनभावनाओं का आदर तो होगा ही, यह बहुप्रतीक्षित कार्य राष्ट्र के चरित्र निर्माण में भी सहायक सिद्ध होगा। श्रीराम भारत की भोर के प्रथम स्वर, राष्ट्र नायक और सबके संबल हैं। पिता की आज्ञा पाकर उन्होंने राजसुख त्याग दिया। वनगमन पथ पर अत्रि-भारद्वाज जैसे ऋषियों से मिले और निषादराज, शबरी और जटायु को भी गले लगाया। खर-दूषण के साथ ही रावण के रूप में उन्होंने दुष्प्रवृत्तियों का दलन भी किया। 

उन्होंने कहा कि श्रीराम जाति, मत, पंथ और संप्रदाय की संकीर्णताओं से परे सर्वभूत हृदय और सर्वव्यापक हैं। मुझे लगता है कि श्रीराम मंदिर में भारत के सांस्कृतिक-आध्यात्मिक वैभव की दिव्य झलक दिखाई देगी और रामलला के रूप में भारत के शौर्य-स्वाभिमान, मर्यादा और चरित्र की पुनर्स्थापना होगी। देवर्षि नारद महर्षि वाल्मीकि से कहते हैं कि राम चरित्र के श्रवण मात्र से मनुष्य के पाप-ताप और संतापों का शमन और व्यक्तित्व में दिव्यता का आरोहण होगा। इसलिए आप श्रीराम का गुणानुवाद लिखकर संसार को उपकृत कीजिए। मुझे लगता है देवर्षि नारद का यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है। 

मेरा ऐसा अभिमत है कि इस पावन मोक्षभूमि के वैभव की पुनर्स्थापना होनी चाहिए। यद्यपि राम ऊंची अट्टालिकाओं, महलों और भौतिक ऐश्वर्य से परे हैं। इसलिए मंदिर निर्माण से भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हम राम के गुणों को आत्मसात करें। रामत्व की सार्थकता तो मनुष्य के रूप में अपनी मर्यादा के सम्यक निर्वहन और उच्चतम मानवीय मूल्यों के अनुपालन में निहित है। इसलिए मंदिर से पहले उन्हें अपने हृदयस्थल में विराजमान कीजिए, उनके दिव्य चरित्र का अनुसरण कीजिए।

राम जीव के पालक, रक्षक और उद्धारक हैं। राम साध्य भी हैं और साधन भी। राम ही चराचर जगत के नियंता हैं।  सच मानिए तो राम भारत की आत्मा हैं। यह संपूर्ण जीव-जगत राम से ही है। राम वो हैं, जो पिता की आज्ञा का मान रखकर राजसुख त्याग देते हैं। राम वो हैं, जो शोषित-पीडि़त और चिरकाल से उपेक्षित वर्ग को गले लगाते हैं। राम वो हैं, जो शबरी के जूठे बेर खाते हैं। राम वो हैं, जो दुर्बल और धर्मानुचरों का संरक्षण करते हैं।

ट्रेन में राम टिकट से होता था अयोध्या का सफर

राम मंदिर आंदोलन के दौरान हम राम टिकट से अयोध्या का सफर करते थे। राम भक्तों से जब टीसी टिकट मांगता तो वह उसे राम टिकट कहकर लौटा देते। ट्रेन में राम भक्तों की संख्या सैकड़ों में होने के कारण कोई कार्रवाई भी नहीं होती थी। हालांकि, इस दौरान कई बार हमें टेन में पथराव और हमले का सामना भी करना पड़ा, लेकिन श्रीराम का नाम और दृढ़ आस्था आगे बढ़ने को प्रेरित करती। 

विश्व हिंदु परिषद के पूर्व प्रदेश महामंत्री महेंद्र प्रताप सिंह नेगी का कहना है कि इस दौरान कई बार जेल भी जाना पड़ा, लेकिन हम पीछे नहीं हटे। मैं 16 वर्ष की आयु में विद्यार्थी जीवन में ही राम मंदिर अभियान से जुड़ गया था। तब न जेब में पैसे थे और न करियर की चिंता ही। बस, राम के प्रति अडिग विश्वास था। 20 वर्ष की आयु में मैं उत्तराखंड से सैकड़ों लोगों को साथ लेकर अयोध्या गया था और कारसेवा की थी। मैं इस आंदोलन के प्रथम 100 कारसेवकों में भी शामिल रहा। फैजाबाद, नजीबाबाद और देहरादून में तीन बार गिरफ्तार भी हुआ। मुझे आज भी याद है कि जब अयोध्या में जनता ढांचा गिरा रही थी, तो उमा भारती समेत कई नेताओं ने उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन लोग नहीं माने। 

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वर्ष 1992 की घटना के बाद जब देहरादून आ रहा था, तो कर्फ्यू के कारण ट्रेन केवल सहारनपुर तक आई और वहां से देहरादून मैं पैदल आया। 1993 से 1996 तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में उत्तराखंड में सक्रिय रहा। तदोपरांत कुछ साल अध्यापन किया और फिर 10 साल तक विश्व हिंदू परिषद में बतौर प्रदेश महामंत्री कार्य किया। इस दौरान उत्तराखंड में जगह-जगह रथ यात्र और जनसभा के माध्यम से जनता को राम मंदिर अभियान से जोड़ा। कई साल के संघर्ष के बाद अब अयोध्या में राम मंदिर बनने जा रहा है। पांच अगस्त को भूमि पूजन है, जिसकी खुशी बयां नहीं की जा सकती।

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