अंकुर अग्रवाल, जेएनएन। शहर में आतंक लगातार बढ़ता जा रहा। यह आतंक हिजबुल या लश्कर का नहीं, लेकिन उससे कम भी नहीं माना जा सकता। शाम ढलते ही लोगों में इनका खौफ पसर जाता है और लोग किसी तरह बचते-बचाते घरों तक पहुंचते हैं। ये कोई और नहीं बल्कि गली-मोहल्लों के आवारा कुत्ते हैं। कारगी, बंजारावाला, सुभाषनगर, क्लेमेनटाउन, चंद्रबनी, रेसकोर्स, कालीदास रोड, नेशविला रोड, देहराखास, सहस्रधारा रोड समेत झंडा मोहल्ला और नेहरू कॉलोनी जैसे इलाकों में रात के वक्त कुत्तों का इस कदर आतंक फैला है कि घर से बाहर निकलने में भी लोगों को दस मर्तबा सोचना पड़ता है।

देर शाम ट्यूशन पढ़कर लौट रहे बच्चे हों या देर रात कार्यालय या दुकान से घर पहुंचने वाले लोग, हर कोई किसी तरह बचते-बचाते ही घर पहुंचते हैं। नगर निगम की हर व्यवस्था आवारा आतंक के सामने बौनी साबित हो रहीं। यानी बात साफ है कि कुत्ते बेखौफ हैं और लोग खौफजदा। 

धौंस जमाकर मुफ्त पार्किंग 

बेवजह लोग शहर के प्रमुख बाजारों पलटन बाजार, धामावाला, तहसील बाजार या डिस्पेंसरी रोड पर इधर-उधर वाहन को खड़ा कर ट्रैफिक पुलिस से आफत क्यों मोल लें। क्योंकि नगर निगम परिसर में जहां चाहे वहां वाहन खड़ा कर बाजार में चाय-नाश्ता और खरीदारी कीजिए। वाहन तो सुरक्षित रहेगा ही साथ ही ट्रैफिक का कोई सिपाही आपको परेशान भी नहीं कर पाएगा। बाहर कहीं सड़क पर गाड़ी खड़ी की तो आफत है।

ट्रैफिक पुलिस उसे क्रेन से पुलिस लाइन में पहुंचा देगी। परेशानी तो होगी ही, जुर्माना भी भरना पड़ेगा। होशियार लोग निगम में ही गाड़ी खड़ी कर रहे हैं। दून अस्पताल में दिखाने आने वाले मरीज ही नहीं बल्कि वहां के चिकित्सक भी इसी पार्किंग में कार खड़ी कर रहे। निगम ने दो माह पूर्व ट्रॉयल पर पेड पार्किंग शुरू तो की, लेकिन कौन है जो जनता से जुड़े सरकारी दफ्तर में पार्किंग दे। धौंसपट्टी जमाई और चल दिए बाजार। 

'पानी' में मास्टर प्लान 

यूं तो नगर निगम का काम शहर को साफ सुथरा रखना है, लेकिन यहां निगम ही शहर को गंदा कर रहा है। दून शहर में वर्षों से चली आ रही जलभराव की समस्या को दूर करने का कोई उपाय अफसरों को दिखाई नहीं पड़ रहा। बेतरतीब ढंग और बिना किसी मास्टर प्लान के जल निकासी को टुकड़ों में बनाए नाली-नालों से पानी का बहाव हुआ जरूर, लेकिन यह पानी एक जगह से दूसरी जगह आकर रुक जा रहा।

चार दशक पूर्व के शहर और वर्तमान शहर की स्थिति का आकलन करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि शहर का विकास बेतरतीब ढंग और बिना किसी प्लान के हुआ। जबकि शहर की सूरत को संवारने के बजाए निगम का फोकस जनता के खून पसीने की कमाई से जमा किए गए हाउस टैक्स की बंदरबांट की नीति बनाने में ही लगा रहता है। अब तक यही तय नहीं कि जल निकासी कहां होगी। 

आमने-सामने दो विभाग 

जिले के दो विभागों में आजकल खूब ठनी हुई है। मामला भी ताजा नहीं, बल्कि पिछले चार माह से चल रहा। संवैधानिक ताकत में एक दूसरे से पीछे नहीं होने का दावा दोनों ठोंकते हैं, लेकिन दोनों विभाग आजकल आमने-सामने हैं। परिवहन और पुलिस विभाग। दोनों का रुतबा शहर की सड़कों पर खूब चलता है। चार माह पहले जब परिवहन विभाग के एक अधिकारी के घर में डकैती का मामला आने के बाद यह टशन शुरू हुई।

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पुलिस ने अधिकारी के घर हुई उस डकैती का खुलासा करने का दावा किया, जो कुछ माह पूर्व हुई तो थी, लेकिन सार्वजनिक नहीं हुई थी। लुटी गई धनराशि पुलिस करोड़ों में बता रही, जबकि पीड़ितों के अनुसार यह बेहद कम थी। करोड़ों की बात सुनकर सतर्कता विभाग भी परिवहन विभाग के पीछे गिद्ध दृष्टि लेकर पड़ गया। आजकल दोनों विभागों में वाहनों के फर्जी बीमा प्रकरण को लेकर जुबानी 'जंग' छिड़ी हुई है।

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Posted By: Raksha Panthari

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