जागरण संवाददाता, देहरादून: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ने स्पीड पकड़ ली है। नए वित्तीय वर्ष के तहत अभी तक जिले में 10.43 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। दरअसल, नवंबर, 2017 में जिओ टैगिंग की त्रिस्तरीय व्यवस्था लागू की गई थी। इसके बाद से काम शुरू होने से पहले, आधा काम होने और कार्य पूर्ण होने पर जिओ टैगिंग हो रही है, जिससे मनरेगा में पारदर्शिता रहे।

जिओ टैगिंग लागू होने के बाद से मनरेगा की गति कम हो गई थी। जहां एक दिन में 200 से ज्यादा कार्यो के प्रस्ताव आते थे, वहां एक महीने में 200 प्रस्ताव आए। इसका कारण ये था कि इस तकनीक को समझने में और इसके अनुसार कार्य करने में कर्मचारियों को परेशानी हो रही थी। इसके बाद ब्लॉक स्तर पर कार्यशाला आयोजित कर कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया गया। नया वित्तीय वर्ष शुरू होने के बाद से अब तक करीब चार हजार कार्यो के प्रस्ताव आ चुके हैं। इनमें से 975 कार्य जिओ टैगिंग की व्यवस्था के तहत स्वीकृत हो चुके हैं।

ये है जिओ टैगिंग की व्यवस्था

ग्राम विकास अधिकारियों के मोबाइल में भुवन एप डाउनलोड कराया गया है। ग्राम पंचायत स्तर से विकास कार्यो के जो प्रस्ताव भेजे जाते हैं, उनका चयन होने के बाद कार्मिक मौके पर जाकर एप में कार्यस्थल की कम से कम दो अलग-अलग एंगल से फोटो अपलोड करेंगे। इसके बाद ही कार्य का मस्टरोल जारी होगा। इसके बाद 30 से 60 फीसद तक काम पूरा होने पर दूसरे चरण की जिओ टैगिंग होगी। अगर इसमें एक फीसद भी कम या ज्यादा का अंतर आया तो सॉफ्टवेयर रिजेक्ट कर देगा। अंतिम जिओ टैगिंग काम पूरा होने के बाद की जाएगी।

समय से हो रहा भुगतान

पिछले साल मनरेगा के तहत श्रमिकों के साथ मैटेरियल पर खर्च होने वाली धनराशि का भुगतान भी काफी विलंब से हुआ। क्योंकि, केंद्र से पैसा देर से मिल रहा था। लेकिन, इस बार ये दिक्कत भी नहीं है। एक अप्रैल से अब तक 10.43 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं और सिर्फ 1.69 करोड़ का ही भुगतान लंबित है। इसमें श्रमिकों का सिर्फ 22 लाख है।

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