चम्पावत, जागरण कार्यालय : जनपद में ऐतिहासिक धरोहरें संरक्षण के अभाव में जीर्ण शीर्ण हो रही हैं। लाखों रुपए खर्चने के बाद भी पुरात्वात्विक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण ईमारतें, किलों और देवालयों को मूल स्वरूप में नहीं लाया जा सका है। मुख्यालय के विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों का सुधलेवा कोई नहीं है। यहां कई ऐतिहासिक स्थल और किले तो पुरात्व विभाग के संरक्षण में नहीं है फलस्वरुप इन ऐतिहासिक स्थलों को दुरस्त करना तो दूर सहेजना तक मुश्किल है।

मालूम हो कुमाऊं की उत्पत्ति का नगर चम्पावत माना जाता है। कला, संस्कृति, रहन-सहन और विभिन्न सरोकार यहां पुष्पित व पल्लवित हुए। सातवीं सदी के आसपास खेतीखान के निकट शोनितपुर के कत्यूरी राजा ने अपनी पुत्री चम्पा का विवाह करने के बाद इस इलाके को अपने दामाद सोमचंद को सौंपा था। झूसी इलाहाबाद से आए चंदवंशीय राजाओं ने इसे अपनी राजधानी बनाया और यहां से पूरे कुमाऊ गढ़वाल सहित तराई भावर तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। इस दौरान उन्होंने चम्पावत के ईदगिर्द कई निर्माण कराए। राजबुंगा किला निर्मित कर उसे शासन सत्ता की धुरी बनाया गया। नगर के शीर्षभाग में बसे इस किले से ही पूरे उत्तराखंड की हुकूमत चलने लगी।

बालेश्वर मंदिर समूह का निर्माण करवाकर इस शिवधाम की ख्याति दूर दूर तक फैली। इसके अलावा रानी चौपड़, विभिन्न नौलों धारों धर्मशालाओं का निर्माण चंदशासन काल के दौरान हुआ। बालेश्वर मंदिर बनाने वाले कारीगर का एक हाथ जब काट दिया तो उसने अपने दूसरे हाथ से ही मायावती आश्रम को जाने वाले मार्ग पर नौले का निर्माण कि या। जिसे एक हथिया नौला कहते हैं। इसी तरह रानी का नौला सहित तमाम ऐतिहासिक धरोहरें जिला मुख्यालय में हैं। जिनमें शिल्पकला की जीवंतता देखते ही बनती है। बालेश्वर मंदिर समूह में तो खजुराहो शैली के भी दर्शन होते है। यहां क्रीडारत 64 योगनियों की मूर्ति कलाकारों ने बेहद खूबसूरती से उकेरी है। जनपद मुख्यालय के अलावा जूप, चैकुनी, तल्ली मादली में ऐतिहासिक शिव मंदिर स्थापित है। खेतीखान में सूर्य मंदिर तो कोणार्क और कटारमल के बाद अपना अलग वजूद रखता है। लोहाघाट के विशुंग गांव में वाणासुर का किला हो या झालीमाली, ब्यानधुरा के अवशेष सब जगह ऐतिहासिकता ही भरी पड़ी है। महाभारत कालीन घटोत्कच्छ मंदिर हो या हिडंबा की स्थली इस जनपद की पुरात्वात्विक श्रेणी को मजबूती देते हैं।

बावजूद इसके इनके संरक्षण की पहल को ठोस रुप नहीं मिल पा रहा है। विकास खंड के पास दूनकोट किले के अब मात्र अवशेष ही शेष हैं। इसी तरह ढकना गांव में चंडाल कोट का किला वजूद खो रहा है। जनपद में दर्जनों ऐतिहासिक धरोहर होने के बावजूद केवल आधा दर्जन देव स्थलों को ही पुरातत्व विभाग ने अपने संरक्षण में लिया है। यहां तक कि चंद राजाओं के शासन का केंद्र बिंदु राजबुंगा किला संरक्षण की श्रेणी में नहीं है। हालांकि इस किले के अंदर वर्तमान में तहसील दफ्तर स्थापित है। और दैवीय आपदा तथा पर्यटन मद से इसका सुधार भी हुआ है। लेकिन उसके मूल स्वरूप को बरकरार रखने की कोशिश किसी ने नहीं की। ऐसा ही हाल बालेश्वर मंदिर समूह का है। जहां लाखों रुपए खर्चने के बाद भी उसका संरक्षण अधूरा छोड़ दिया गया है। यहां वर्ष 2005 के आसपास कार्य शुरु किया गया। लेकिन उसे मूल स्वरूप में वापस नहीं लाया जा सका है। मंदिरों के शिलाखंड यत्र तत्र बिखरे हैं। तो मंदिर जीर्णोद्धार का कार्य बजट के अभाव में ठप है। क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी कहते हैं कि इसके लिए स्वीकृत बजट का उपयोग हो चुका है। जिसमें मंदिर में पटाल लगाने सहित उसे मूल स्वरूप में लाने के लिए कार्य किए गए हैं। अब फिर बजट के लिए डिमांड रखी गई है।

बहरहाल जो भी हो जनपद के तमाम ऐतिहासिक स्थल पर्याप्त संरक्षण न मिल पाने के कारण अपना मूल स्वरूप खो रहे हैं। यदि समय रहते इनके संरक्षण के लिए ठोस व कारगर नीति नहीं बनी तो इन ऐतिहासिक स्थलों के अस्तित्व पर खतरा मंडराना तय है।

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पर्यटन की त्रिवेणी है चम्पावत

चम्पावत: कुमाऊं मंडल कर्मचारी निगम के केंद्रीय अध्यक्ष दिनेश गुरुरानी कहते हैं कि चम्पावत जनपद में ऐतिहासिक पर्यटन की भरमार है। यदि इस ओर थोड़ा भी ध्यान दिया जा तो यहां पर्यटन को आर्थिक उन्नति का सबसे कारगर जरिया बनाया जा सकता है। यहां ऐतिहासिकता के साथ ही राफ्टिंग, रॉक कलाइंबिंग, पैरासेलिंग जैसे इवेंट कराए जा सकते हैं। यह जनपद तो ऐतिहासिक धार्मिक, साहसिक व नैसर्गिक पर्यटन की त्रिवेणी है। बस जरुरत है पहल करने की।

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