गोपेश्‍वर, चमोली [देवेंद्र रावत]: जर्मनी में जा बसी यह बेटी अपनी माटी को नहीं भूली। विदेशी पर्यटकों को उत्तराखंड के गांवों तक पहुंचा वह उन्हें स्थानीय घरों में ठहराती है ताकि ग्रामीणों की आमदनी हो सके। सीमांत चमोली जिले के पोखरी विकासखंड की पूनम रावत हाने जर्मनी में रहते हुए भी पहाड़ के गांवों की गरीबी दूर करने के लिए यहां लोगों को स्वरोजगार से जोड़ रही हैं। खासतौर पर गरीब लोगों के घरों में होम स्टे के जरिये पर्यटकों को ठहराकर वह दस से अधिक गांवों के कई परिवारों में स्वावलंबन की आस जगा रही हैं। बीते दो साल में यहां 20 से अधिक परिवारों को स्थायी रोजगार मिल चुका है।

पोखरी विकासखंड के ग्राम रौली ग्वाड़ की मूल निवासी पूनम वर्तमान में जर्मनी के बिंगन शहर में रह रही हैं। सेना में मेजर रहे पिता की इस बेटी की शिक्षा देश के विभिन्न हिस्सों में हुई। दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीकॉम ऑनर्स और फिर इंटीरियर एंड एक्सटीरियर डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद वर्ष 1998 में उन्हें नीदरलैंड की सन माइक्रो सिस्टम कंपनी में कंट्री रिप्रजेंटेटिव के पद पर नियुक्ति मिली और वह नीदरलैंड चली गईं। वर्ष 2003 में पूनम का जर्मनी के डोएच बैंक में आइटी प्रोजेक्ट मैनेजर थॉमस हाने से विवाह हुआ और वह वहीं बस गईं। लेकिन अपनी माटी के प्रति जुड़ाव उन्हें लगातार बेचैन करता रहा। जिसकी परिणति गांव में गरीब, असहाय एवं जरूरतमंदों की सेवा के संकल्प के रूप में हुई और फिर पूनम नियमित अंतराल पर अपने पैतृक गांव आने लगीं। वह गांव में ऐसे परिवारों की मदद करती हैं, जिनके पास कमाई का कोई जरिया नहीं है।

गांव में बच्चों को पढ़ाती थीं अंग्रेजी 

पूनम हालांकि शहरों में ही पली-बढ़ी, लेकिन स्कूल की छुट्टियों के दौरान जब भी उन्हें गांव आने का मौका मिलता, वह बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाया करती थीं। अपने गुल्लक में जमा धनराशि से वह बच्चों के लिए अंग्रेजी की किताबें और अन्य पाठ्य सामग्री लाती थीं।

विदेशी पर्यटकों को कराती हैं गांव की सैर

जर्मन पर्यटकों को बेहतर टूर और गाइडेंस मुहैया कराते हुए वह होम स्टे के जरिये उन्हें गांव के लोगों के पारंपरिक घरों में ही ठहराती हैं। यहां पर्यटकों के लिए सभी सुविधाएं जुटाई गई हैं। कहती हैं, इससे उनका भी अपनी माटी से जुड़ाव बना हुआ है। पूनम ने होम स्टे की शुरुआत सबसे पहले अपने पैतृक घर को संवारकर की। कहती हैं, गरीब, विधवा व जरूरतमंद महिलाओं को होम स्टे के माध्यम से स्थायी रोजगार देने के लिए वह 2015 से विदेशी मेहमानों को गांव में ला रही हैं। अब तक वह एक हजार से अधिक विदेशी पर्यटकों को यहां लाकर लोगों के घरों में ठहरा चुकी हैं।

सभी गांवों में हैं पर्यटकों के ठहरने का इंतजाम

पूनम विदेशी मेहमानों को विलेज प्रोग्राम के तहत रौली ग्वाड़, डुंगरी, नैणी, देवर खडोरा सहित एक दर्जन से अधिक गांवों में ले जाती हैं। सभी गांवों में पर्यटकों के खाने-ठहरने का इंतजाम है। उन्हें स्थानीय व्यंजन ही परोसे जाते हैं। खास बात यह कि पर्यटकों को बेहतर व गुणवत्तायुक्त सुविधाएं दिलाने के लिए पूनम उनकी जरूरतों के अनुसार संबंधित ग्रामीण परिवारों को आवश्यक मार्गदर्शन और  वस्तुएं भी उपलब्ध कराती हैं। पूनम कहती हैं कि उनका प्रयास यहां के ट्रैकिंग रूट, धार्मिक स्थल और बुग्यालों से लगे गांवों में होम स्टे विकसित करना है ताकि यहां पर्यटकों की निरंतर आवाजाही बनी रहे। बकौल पूनम, विदेशी पर्यटक गांवों की सभ्यता, संस्कृति, खूबसूरती व दिनचर्या से खासे प्रभावित हो रहे हैं। वे यहां के जैविक उत्पाद खरीदने में भी रुचि दिखाते हैं।

पर्यटकों के लिए है स्थानीय पहनावे की बाध्यता

पूनम विदेशियों को चमोली भ्रमण पर लाने से पहले उनका साक्षात्कार लेती हैं। उन्हें पहाड़ के परिवेश एवं संस्कारों के बारे में पहले ही अवगत करा दिया जाता है। स्थानीय पहनावे की बाध्यता भी उनके टूर के साथ जोड़ी जाती है और यहां उनसे स्थानीय पहनावे की खरीद भी कराई जाती है।

चूल्हे पर बना खाना पसंद कर रहे विदेशी 

डुंगरी गांव की 31 वर्षीय सविता देवी की तीन बेटियां हैं। सविता जब 21 वर्ष की थी, तब पति की मौत हो गई थी। सविता कहती हैं कि पूनम के प्रयासों से ही उसका परिवार अपने पैरों पर खड़ा हो पाया है। हर साल कई विदेशी पर्यटक उनके घर पर ठहरते हैं, जिससे अच्छी आमदनी हो जाती है। विदेशी मेहमानों के आने की सूचना उसे एक सप्ताह पहले ही मिल जाती है। कहती हैं, विदेशियों को चूल्हे पर बना खाना बेहद पसंद है। इसलिए वह चूल्हे पर खाना बनाने की ही फरमाइश करते हैं। 

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Posted By: Sunil Negi